पुणे में ट्रैफिक संकट पर तीखी बहस, पीएमपीएमएल और डीपी सड़कों पर उठे सवाल
PMPML Corruption Allegation News: पुणे मनपा की आमसभा में ट्रैफिक जाम, टीडीआर प्रक्रिया में देरी और पीएमपीएमएल के कामकाज को लेकर तीखी बहस हुई। नगरसेवकों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे टैंकर जल आपूर्ति घोटाला (सोर्सः सोशल मीडिया)
Pune Traffic TDR Delay: शहर में बढ़ती ट्रैफिक जाम की समस्या, लंबित डीपी सड़कों, हस्तांतरणीय विकास अधिकार (टीडीआर) प्रक्रिया में देरी और पुणे महानगर परिवहन महामंडल लिमिटेड (पीएमपीएमएल) के कामकाज पर उठते सवालों के बीच बुधवार को पुणे मनपा की आम सभा (जनरल बॉडी) की बैठक में तीखी बहस हुई।
विभिन्न दलों के नगरसेवकों ने प्रशासन पर सवालों की बौछार करते हुए जनसमस्याओं के प्रति अनदेखी को लेकर भारी नाराजगी जताई। बैठक की शुरुआत में ही पीएमपीएमएल में हुए कथित भ्रष्टाचार के विरोध में कांग्रेस नगरसेवकों ने प्रदर्शन किया।
नवले ब्रिज और ट्रैफिक का मुद्दा गरमाया
महापौर मंजुषा नागपुरे ने आश्वासन दिया कि पीएमपीएल के मुद्दे पर जल्द ही एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी। सदन में ट्रैफिक जाम और सड़कों के अपर्याप्त जल का मुद्दा सबसे प्रमुख रहा। नगरसेवक हरिदास चरवड ने नवले ब्रिज क्षेत्र में हो रहे हादसों पर प्रशासन को घेरते हुए पूछा, ‘आखिर कितनी जान जाने के बाद प्रशासन की नींद खुलेगी?’ वहीं, सुहास टिंगरे ने लोहगांव-धानोरी मार्ग पर भीषण ट्रैफिक के कारण नागरिकों के घंटों फंसे रहने पर चिंता जताई। निवृत्ती बांदल ने मोहम्मदवाड़ी-उंड्री सड़क का काम 2004 से लंबित होने पर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
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सड़क क्षेत्र के आंकड़ों पर चिंता
काका चव्हाण ने सावित्री गार्डन से लोकमत प्रेस रोड की स्थिति को ‘बरमूडा ट्रायंगल’ बताया, जबकि गौरव घुले ने हडपसर के महेश सोसायटी चौक को बंद किए जाने से हो रही परेशानी की ओर ध्यान दिलाया, शहर अभियंता अनिरुद्ध पावसकर ने कहा कि पुणे में सड़क क्षेत्र केवल 9 से 9.5% है, जबकि नियमानुसार यह 15% होना चाहिए। प्रतिदिन 1200 से 1350 नए वाहनों के पजीकरण से सड़कों पर दबाव बढ़ रहा है।
नगरसेवकों ने दी चेतावनी
- सड़कें पूरी होने तक नए प्रोजेक्ट्स को अनुमति न दी जाए।
- अतिक्रमण हटाने के लिए कठोर कार्रवाई हो।
- ‘मिसिंग लिंक’ के काम को प्राथमिकता दी जाए।
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जटिल प्रक्रिया को लेकर प्रशासन कटघरे में
डीपी सड़कों और टीडीआर प्रक्रिया को लेकर भी नगरसेवक आक्रामक दिखे। प्रशांत जगताप, नीलेश निकम और स्वप्निल दुधाने ने इस प्रक्रिया को जटिल बताते हुए कहा, ‘जब टीडीआर के लिए चार-चार साल चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो नागरिक अपनी जमीन क्यों देंगे?’ राजाभाऊ बराटे ने पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन करने की मांग की, जबकि सचिन दोडके ने विभागों के बीच समन्वय की कमी को देरी का कारण बताया।
