Pune News: फ्लाईओवरों का जाल, फिर भी बेहाल पुणे की ट्रैफिक व्यवस्था

Pune flyover failure: पुणे में ट्रैफिक सुधार के लिए बनाए गए फ्लाईओवर गलत डिजाइन, मेट्रो से टकराव और समन्वय की कमी के चलते समाधान नहीं, बल्कि नई समस्या बन गए हैं।
Pune Flyovers
पुणे फ्लाईओवर (सौ. सोशल मीडिया )
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Pune Traffic News: पुणे की सड़कों पर रेंगते वाहन और घंटों तक ट्रैफिक में फंसे नागरिक शहर की नियति बन चुके हैं। शहर की इस दमघोंटू यातायात समस्या को सुलझाने के लिए प्रशासन ने 'फ्लाईओवरों का बाल' बिछाने का फार्मूला अपनाया, लेकिन करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी जमीनी हकीकत नहीं बदली।

त्रुटिपूर्ण डिजाइन, विभागों में समन्वय की कमी और दूरदर्शिता के अभाव ने इन फ्लाईओवरों को समाधान के बजाय नई समस्याओं का केंद्र बना दिया है।

डिजाइन की चूक और करोड़ों की बर्बादी

पुणे में फ्लाईओवर निर्माण का इतिहास जितना विकास से जुड़ा है, उत्तना ही 'तोड़फोड़' से भी। सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय चौक का उदाहरण सामने है, जहां गलत डिजाइन के कारण बने-बनाए फ्लाईओवर को कोरोना काल में जमींदोज करना पड़ा। अब वहां दोबारा निर्माण चल रहा है, जिससे जनता के टैक्स का पैसा और समय दोनों बर्बाद हो रहे हैं। यही हाल चांदनी चौक का रहा, जिसे पूरी तरह तोड़कर नए सिरे से बनाना पड़ा। उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने भी स्वीकार किया है कि तकनीकी जानकारी होने के बावजूद अधिकारियों द्वारा गलत डिजाइन बनाना शहर के लिए घातक साबित हुआ है।

फ्लाईओवर बनाने में समन्वय का अभाव

शहर के नियोजन में सबसे बड़ी खामी मेट्रो और फ्लाईओवर परियोजनाओं के बीच टकराव है। सिंहगढ़ रोड पर हाल ही में भारी भरकम फ्लाईओवर खोला गया, लेकिन अब खबर है कि प्रस्तावित खडृकवासला हडपसर मेट्रो कॉरिडोर के लिए इसे 66 जगहों पर तोड़ना होगा। सवाल यह उठता है कि क्या पलाईओवर बनाने से पहले मेट्रो रूट का ध्यान नहीं रखा गया? यही स्थिति मगरपट्टा और गाठीतल क्षेत्रों की है। जहां मेट्रो के लिए मौजूदा पुलों को हटाने की नौबत आ गई है। फ्लाईओवर का उद्देश्य ट्रैफिक को गति देना होता है, लेकिन पुणे में स्थिति उलट है।

और 'बॉटलनेक' विरोधाभासी दृश्य

कई जगहों पर फ्लाईओवर उतरते ही सड़कें संकरी ही जाती हैं, जिससे वहां और भी भयानक 'बॉटलनेक' बन जाते हैं। शहर में कई ऐसे फ्लाईओवर है जो ऊपर से खाली नजर आते हैं। जबकि उनके नीचे सर्विस रोड पर वाहनों का अंबार लगा रहता है। वाहनों की संख्या का सही वैज्ञानिक आकलन न करना इसका मुख्य कारण है।

लंबित परियोजनाओं से जनता परेशान

  • कात्रज चौक जैसे प्रमुख जंक्शन पर भूमि अधिग्रहण की सुस्त प्रक्रिया ने प्रोजेक्ट को सालों पीछे धकेल दिया है। वहीं, मुंबई-बेंगलुरु राजमार्ग पर स्थित 'नवले पुल' प्रशासन की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
  • इसके जानलेवा ढलान को ठीक करने के लिए करोड़ों खर्च किए गए, लेकिन दुर्घटनाओं और जाम का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है, सिर्फ कंक्रीट का ढांचा खड़ा कर देना समाधान नहीं है।
  • पुणे को आज एक ऐसी 'इंटीग्रेटेड ट्रैफिक पॉलिसी' की जरूरत है जहां मेट्रो, फ्लाईओवर और सार्वजनिक परिवहन (PMPML) एक-दूसरे के पूरक हों, न कि बाधक।
  • जब तक नियोजन में दूरदर्शिता नहीं आएगी, पुणेवासी इसी तरह विकास के नाम पर विनाशकारी ट्रैफिक झेलने को मजबूर रहेंगे।
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