अजित पवार व देवेंद्र फडणवीस (सोर्स: सोशल मीडिया)
Pune Municipal Election: पुणे महानगरपालिका चुनाव के लिए कई दिनों से चल रहा प्रचार का शोर मंगलवार की शाम साढ़े पांच बजे थम गया। अब कल यानी गुरुवार 15-जनवरी को वोट डाले जाएंगे, आज 14 जनवरी को दिन भर शहर में प्रचार का शोर तो सुनाई नहीं देगा, लेकिन उम्मीदवारों द्वारा अपने स्तर पर संपर्क साधकर अपने मतदाताओं तक आखिरी बार पहुंचने की कोशिश जरुर नजर आएगी।
चुनाव प्रचार के आखिरी दिन मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, डीसीएम अजीत पवार, मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे, सांसद सुप्रिया सुले, केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल, सुनील तटकरे सहित कई दिग्गज नेताओं की सभाओं और रोड शो से शहर का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्मी रहा, दूसरी तरफ मतदान के दिन की तैयारियों और संभावित पैसे बांटने जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए पार्टियों ने अपने अपने कार्यकर्ताओं को सतर्क कर दिया हैं।
पुणे महानगरपालिका के लिए 15 जनवरी को वोट डाले जाएंगे। शहर के 41 प्रभागों की 165 सीटों के लिए 1,165 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे जिनमें से दो उम्मीदवार निर्विरोध चुने जा चुके हैं। इस तरह अब 163 सीटों के लिए 1,163 उम्मीदवारों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी।
चुनाव मैदान में भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट), शिवसेना (शिंदे), कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट), शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे), आम आदमी पार्टी, वंचित बहुजन आघाडी, बहुजन समाज पार्टी और कई निर्दलीय उम्मीदवार हैं।
आखिरी दिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ-साथ कई मंत्री और राज्य स्तरीय नेता शहर में प्रचार के लिए पहुंचे थे। वहीं केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल ने पूरे चुनाव अभियान के दौरान पुणे में डेरा जमाए रखा, दूसरी और डिप्टी सीएम अजित पवार ने शुरू में एकतरफा लग रहे चुनाव को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। खास तौर पर पुणेकरों को मेट्रो और बस में मुफ्त सफर देने की घोषणा ने भाजपा को राजनीतिक रूप से असहज कर दिया है जिसके बाद भाजपा की ओर से अजीत पवार पर तीखे हमले किए गए।
इस चुनाद में न तो महायुति और न ही महाविकास आपाड़ी अपने पारंपरिक रूप में दिखी। भाजपा, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरी। वहीं महाविकास आघाड़ी में अंतिम समय में टूट पड़ गई, जब शरदचंद्र पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस ने ऐन वक्त पर अजित पवार की पार्टी से हाथ मिला लिया। इसके चलते कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ही आघाड़ी में बचे जिन्होंने मनसे को साथ लिया।