अजित के गढ़ में फेरबदल से सियासी हलचल तेज, अपनों के निशाने पर एक बार फिर आई भाजपा

Pune News: पुणे महापालिका चुनाव से पहले अंतिम प्रभाग सीमांकन ने शहर की राजनीति गरमा दी है। अजित पवार के गढ़ में बदलाव से नाराजगी बढ़ी है जबकि भाजपा को इसका सीधा फायदा मिलता दिख रहा है।
अजित के गढ़ में बीजेपी की चाल (pic credit; social media)
अजित के गढ़ में बीजेपी की चाल (pic credit; social media)
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Pune Municipal Corporation Elections: राज्य निर्वाचन आयोग ने शनिवार को पुणे महापालिका चुनाव के लिए अंतिम प्रभाग संरचना जारी कर दी है। संशोधित सीमांकन ने शहर की राजनीति में भूचाल ला दिया है। खासकर उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजीत पवार गुट) के नेता अजीत पवार के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में किए गए बदलाव ने सियासी हलचल और तेज कर दी है।

राजनीतिक हलकों का मानना है कि भाजपा ने इस सीमांकन में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चतुराई दिखाई है। हडपसर, खड़कवासला और वडगांव शेरी जैसे इलाकों में प्रभागों की सीमाएं बदलकर सीधे-सीधे भाजपा के लिए रास्ता आसान किया गया है। ये वही इलाके हैं, जहां अजीत पवार गुट की पकड़ मजबूत रही है। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि भाजपा ने अपने महायुति सहयोगियों से बिना चर्चा किए ये सीमांकन तय करवा लिया।

वहीं, विपक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्रों में कोई बदलाव न होना भी सवाल खड़े करता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अंतिम प्रभाग रचना में भाजपा का दबदबा रहा है। खासकर शहर के मध्यवर्ती इलाके, कसबा पेठ और शिवाजीनगर, जहां पहले से ही भाजपा की पकड़ मजबूत है, वहां सीमाएं इस तरह तय की गईं कि पार्टी को सीधा फायदा हो। कई आपत्तियां दर्ज होने के बावजूद निर्वाचन आयोग ने उन्हें खारिज कर दिया।

2017 के चुनाव की पृष्ठभूमि देखें तो उस वक्त भी जिन प्रभागों से राष्ट्रवादी और शिवसेना को अच्छा प्रदर्शन मिला था, वहां सीमांकन में भाजपा को लाभ पहुंचाने वाले बदलाव किए गए थे। इस बार भी तस्वीर कुछ वैसी ही नजर आ रही है।

सूत्रों की मानें तो अजित पवार ने पहले ही इस पर नाराज़गी जताई थी। यही वजह है कि अंतिम संरचना में खड़कवासला, हडपसर और वडगांव शेरी में मामूली संशोधन कर संतुलन बनाने की कोशिश की गई। लेकिन स्थानीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ सहयोगी दलों में असंतोष अब भी कायम है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह सीमांकन भाजपा के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।महायुति में चल रहा तनाव। सहयोगियों की नाराजगी अगर दूर न हुई तो चुनावी मैदान में भाजपा को अकेले ही बोझ उठाना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, अंतिम प्रभाग रचना ने चुनाव से पहले पुणे की राजनीति को गरमा दिया है। भाजपा जहां रणनीति के तहत फायदे में दिख रही है, वहीं अजीत पवार और अन्य सहयोगियों को अब नए समीकरण बनाकर मैदान में उतरना होगा।

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