बायोगैस (सोर्स - सोशल मीडिया)
Wardha Rural Development News: पुलगांव अंतरराष्ट्रीय युद्धों के कारण हर जगह ईंधन की कमी उत्पन्न हो गई है। व्यवसायिक गैस की अनुपलब्धता के कारण होटल, ढाबे और छोटे व्यवसायों पर बड़ा असर पड़ा है। रसोई गैस प्राप्त करने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। लेकिन, ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवारों पर ईंधन की कमी का प्रभाव नहीं पड़ा है। उनके लिए बायोगैस (गोबर गैस) वरदान साबित हो रहा है।
कम खर्च में ईंधन मिलने के साथ-साथ कृषि के लिए खाद की भी सुविधा होती है। बायोगैस परियोजना ईंधन और खाद, दोनों आवश्यकताओं को पूरा करने वाला उत्तम विकल्प है। इस वजह से, कुछ समय पहले गांव-गांव में हर घर में बायोगैस दिखाई देने लगा था। लेकिन, गाय, बैल और भैंस जैसे पशुओं की संख्या घट गई। हाल ही में सरकारी अनुदान के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में सिलेंडर आसानी से मिलने लगे, जिससे बायोगैस का उपयोग कम होने लगा।
लेकिन अब गैस की कमी ने इसका महत्व फिर से उजागर कर दिया है। ग्रामीण लोग पुनः बायोगैस निर्माण की ओर लौट रहे हैं। बायोगैस परियोजना स्थापित करने में केवल 18,000 रुपये का खर्च आता है। घर के पिछे में खाली जगह पर भूमिगत टैंक बनाया जाता है और उसमें गोबर और पानी का मिश्रण रखा जाता है। इससे बनने वाला गैस पाइप के माध्यम से रसोई तक पहुंचाया जाता है, जबकि बचा हुआ मिश्रण कृषि के लिए खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे फसल भी अच्छी होती है।
बायोगैस अवधारणा ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत उपयोगी साबित हो रही थी। किसान कृषि के साथ-साथ मुर्गी पालन, बकरी पालन और दुग्ध उत्पादन जैसे सहायक व्यवसाय कर रहे थे। पशु पालन के कारण गोबर और गोबर खाद की आपूर्ति होती थी। अधिकतर घरों में बायोगैस देखा जा सकता था। इससे ग्रामीण परिवारों के लिए बायोगैस वरदान साबित हो रहा था। लेकिन पशुधन की कमी के कारण गोबर और गोबर खाद मिलना दुर्लभ हो गया।
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अंतरराष्ट्रीय युद्धों के कारण रसोई गैस मिलना कठिन हो गया है। लेकिन मुझे इसका नुकसान नहीं हुआ। मैंने अपने घर के पीछे बायोगैस निर्माण किया है। जिसे 52 वर्ष हो गए है। हमने घर के लिए कभी भी सिलेंडर नहीं खरेदी किया है। इसके कारण गैस की आपूर्ति लगातार बनी हुई है। बायोगैस की ओर लौटने से गैस की कमी को पूरा किया जा सकता है। इसके साथ ही कृषि के लिए उत्तम खाद की भी सुविधा होती है। (दिनकरराव ओक, किसान)