नासिक में TJSB बैंक से 38 करोड़ की ठगी, बाफना ज्वैलर्स के निदेशक नीलेश बाफना की जमानत याचिका खारिज
Nashik TJSB Bank Fraud: नासिक के TJSB बैंक से 38 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी मामले में बाफना ज्वैलर्स के निदेशक नीलेश बाफना को झटका। सत्र अदालत ने खारिज की अग्रिम जमानत याचिका।
- Written By: रूपम सिंह
बाफना ज्वैलर्स (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nashik TJSB Bank Fraud Bafna Jewellers: महाराष्ट्र के सांस्कृतिक और औद्योगिक केंद्र नासिक शहर से एक बहुत बड़ा आर्थिक घोटाले का मामला सामने आया है। नाशिक के बहुचर्चित 38 करोड़ रुपए के टी.जे.एस.बी. (ठाणे जनता सहकारी) बैंक धोखाधड़ी मामले में बाफना ज्वैलर्स के मुख्य निदेशक नीलेश बाफना की ओर से दायर की गई जमानत याचिका को सत्र न्यायालय ने आखिरकार पूरी तरह खारिज कर दिया है। इस बड़े फैसले से आरोपी पक्ष को तगड़ा झटका लगा है।
क्या है पूरा मामला और फर्जीवाड़े का खेल ?
प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार, बाफना ज्वैलर्स की दुकान के भीतर प्रत्यक्ष रूप से केवल 25 लाख 19 हजार रुपए का ही माल मौजूद था, लेकिन इसके बावजूद बैंक से बड़ा ऋण लेने के लिए उसे कागजों पर 59 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य का भारी-भरकम स्टॉक होना बताया गया।
इसके लिए पूरी तरह झूठे और फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए थे। इन्हीं फर्जी दस्तावेजों और कागजी गढ़त के आधार पर टी. जे।एस.बी. सहकारी बैंक से लगातार भारी मात्रा में कर्ज लिया गया और कुल 38 करोड़ रुपए का बड़ा वित्तीय गबन किया गया।
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इस गंभीर मामले का खुलासा होने के बाद बाफना ज्वैलर्स के निदेशकों और उनके जमानतदारों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया था। इसी मामले में अपनी गिरफ्तारी से बचने और राहत पाने के लिए निदेशक नीलेश बाफना ने अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसे माननीय न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए ठुकरा दिया है।
नामजद आरोपियों का विवरण
इस हाई-प्रोफाइल धोखाधड़ी के मामले में जिन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और नामजद मामला दर्ज किया गया है, उनमें बाफना ज्वैलर्स के निदेशक नीलेश बाफना, सुभाष बाफना, नम्रता बाफना और प्रभावती बाफना सभी निवासी-बाफना हाउस, गायकवाडनगर, तिडके कॉलोनी शामिल हैं। इसके अलावा उनके प्रमुख जमानतदार कांतिलाल बाफना निवासी अगम बंगला, तिडके कॉलोनी तथा सरला बाफना निवासी बाफना हाउस के नाम भी इस सूची में शामिल हैं।
दस्तावेज पहले से ही बैंक और पुलिस के पास सुरक्षित
अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान आरोपी नीलेश बाफना के अधिवक्ताओं ने अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि यह पूरा मामला किसी आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह केवल समय पर बैंक के कर्ज का भुगतान न हो पाने के कारण उत्पन्न हुआ एक दीवानी (सिविल) और व्यावसायिक विवाद मात्र है। बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत को यह भी बताया कि बैंक द्वारा विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत पहले ही वसूली की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है और संबंधित संपत्तियों को भी अपने कब्जे में ले लिया गया है।
इसके अलावा, बैंक को पहले ही 50 करोड़ रुपए से अधिक की बड़ी राशि लौटाई जा चुकी है, तथा 10.21 करोड़ रुपए का एक अन्य लोन पूरी तरह चुकाया जा चुका है। इसलिए बैंक के साथ किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी करने का कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था। वकीलों ने यह भी दलील दी कि आरोपी की नासिक पुलिस कस्टडी की पूछताछ पूरी हो चुकी है और उसने जांच में पूरा सहयोग किया है, तथा इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज पहले से ही बैंक और पुलिस के पास सुरक्षित रूप से उपलब्ध हैं।
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टी.जे.एस.बी. बैंक घोटाला मामला
दूसरी ओर, राज्य की ओर से पैरवी कर रहे सरकारी वकील ने अदालत में इन दलीलों का जोरदार खंडन किया। सरकारी वकील ने न्यायाधीश के समक्ष खुलासा किया कि आरोपी ने बैंक को गुमराह करने के लिए 59.65 करोड़ रुपए का सोना, चांदी और हीरों का भारी स्टॉक होने की झूठी और मनगढंत रिपोर्ट पेश की थी।
लेकिन जब प्रशासनिक स्तर पर इसकी प्रत्यक्ष जांच की गई, तो मौके पर केवल 25.19 लाख रुपए के सामान्य बर्तन ही बरामद हुए। इसका मतलब यह है कि कागजों पर दिखाए गए स्टॉक में से लगभग 59.40 करोड़ रुपए का बेशकीमती सोना-चांदी का स्टॉक पूरी तरह गायब या ठिकाने लगा दिया गया है,
सुनियोजित तरीके से लूट
सरकारी वकील ने पुरजोर तरीके से तर्क दिया कि यह केवल बैंक का कर्ज न चुका पाने की मामूली असफलता का विषय नहीं है, बल्कि आम जनता की गाढ़ी कमाई यानी सार्वजनिक निधि के साथ सुनियोजित तरीके से धोखाधड़ी करने के लिए रचा गया एक बहुत बड़ा आपराधिक षड्यंत्र है।
दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद, माननीय न्यायाधीश एस. पी. बाबर ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि लगभग 59 करोड रुपए का यह इतना बड़ा वित्तीय अंतर कोई साधारण बात नहीं है, बल्कि यह अत्यंत गंभीर मामला है।
यह पूरी तरह फर्जी और जाली दस्तावेजों के माध्यम से की गई एक सोची-समझी धोखाधड़ी है। अदालत ने यह भी विशेष रूप से रेखांकित किया कि इस मामले में गायब हुआ करोड़ों रुपए का कीमती स्टॉक अभी तक बरामद नहीं किया जा सका है। ऐसे में यदि मुख्य आरोपी को जमानत का लाभ दिया जाता है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वह मामले से जुड़े महत्वपूर्ण सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है या गवाहों पर अनुचित दबाव बना सकता है।
