नागपुर में HC का कड़ा रुख: बार-बार समय मांगने वाले सरकारी महकमों को फटकार, कार्यप्रणाली सुधारने के निर्देश

Nagpur High Court Rebuke: सरकारी विभागों द्वारा समय पर शपथपत्र दाखिल नहीं करने और लगातार मोहलत मांगने पर HC ने कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने चेतावनी दी कि भविष्य में देरी पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
Nagpur HC takes a tough stance: Reprimands government departments repeatedly seeking extensions and directs them to improve their functioning.
हाई कोर्ट, सरकारी विभाग,(सोर्स सोशल मीडिया)
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Nagpur Government Affidavit Filing Delay: नागपुर मामलों की सुनवाई के दौरान लगातार सरकारी पक्ष की ओर से जवाब दायर करने के लिए समय मांगे जाने तथा समय देने के बावजूद निर्धारित समय पर शपथपत्र दायर नहीं किए जाने पर सरकारी विभागों में व्याप्त लालफीताशाही, लेटलतीफी और प्रशासनिक उदासीनता को लेकर हाई कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकारी महकमों ने अपनी कार्यप्रणाली में तत्काल सुधार नहीं किया और समय पर जवाब दाखिल नहीं किए तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।

....और मंत्रियों का ढुलमुल रवैया

अदालत ने अधिकारियों की कार्यशैली पर सीधा प्रहार करते हुए एक अवमानना याचिका का विशेष रूप से जिक्र किया। इस मामले में तय समय सीमा खत्म होने के बावजूद एक सरकारी अधिकारी ने इतनी 'धृष्टता' दिखाई कि उसने सरकारी वकील से अदालत से अवमानना के मामले में भी और मोहलत मांगने को कह दिया, वह भी तब जब समय बढ़ाने का कोई औपचारिक आवेदन ही नहीं दिया गया था।

अदालत ने मंत्रियों के रवैये पर भी सवाल उठाए हैं। जहां कोर्ट ऐसे मामलों को एक महीने में निपटाने का आदेश देता है वहीं 6 महीने बाद मामला सामने आने पर मंत्री और 2 महीने का समय मांग लेते हैं। दूसरी ओर, कुछ मामलों में भारी विसंगतियां हैं।

जैसे 6 तारीख को एक व्यक्ति अयोग्य घोषित होता है, 8 तारीख को अपील दायर कर स्टे (रोक) ले आता है और फिर 6 महीने तक उस मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध ही नहीं किया जाता। इसके विपरीत एक अन्य अपील जो 1997 में दायर की गई थी और जिस पर अवैध निर्माण की धारा 53 के तहत रोक लगी थी, उस पर दशकों बीत जाने के बाद भी आज तक फैसला नहीं हो सका है।

वकीलों को भी नसीहत

कोर्ट के वक्तव्य को स्वीकार करते हुए सरकारी वकील कार्यालय की ओर से भी बताया गया कि प्रशासनिक कमियों के साथ-साथ वकीलों को भी नसीहत दी जानी चाहिए कि वे हर मामले में गैर जरूरी रूप से राज्य के अनगिनत विभागों को प्रतिवादी न बनाएं, उन्होंने कहा कि कई बार मामलों में बिना वजह सात या उससे अधिक उत्तरदाताओं (सरकारी प्रतिवादी विभागों) को शामिल कर लिया जाता है जिससे सभी से जवाब मंगाने की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होती है, जबकि केवल आवश्यक दो या तीन विभागों को ही नोटिस भेजा जाना चाहिए।

अंततः सरकारी पक्ष ने अदालत को आश्वस्त किया है कि वे 70-80% मामलों में हो रही देरी और कमियों को सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं और इसके लिए अदालत से कुछ और समय देने का आग्रह किया है।

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