नासिक में लैब रिपोर्ट की सुस्ती से मिलावटखोर बेखौफ; 350 में से 270 सैंपलों की जांच महीनों से अटकी
Nashik FDA Raid: नासिक में लैब रिपोर्ट में 6-7 महीने की देरी के कारण मिलावटखोरों पर कार्रवाई ठप है। एफडीए द्वारा लिए गए 350 खाद्य नमूनों में से 270 की रिपोर्ट अब भी लंबित है।
- Written By: रूपम सिंह
लैब रिपोर्ट ,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Food Adulteration Nashik: मिलावटखोरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत नासिक जिले में खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने ताबड़तोड़ छापेमारी तो की है, लेकिन लैब से जांच रिपोर्ट समय पर न मिलने के कारण आगे की कानूनी कार्रवाई पूरी तरह ठप पड़ी है। नियमानुसार जो रिपोर्ट 14 दिनों के भीतर मिलनी चाहिए, उसके लिए खाद्य सुरक्षा विभाग को 6 से 7 महीने का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
पिछले 6 महीनों में एफडीए ने विभिन्न खाद्य प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई करते हुए खाने-पीने की चीजों के करीब 350 नमूने इकट्ठा किए, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल 80 नमूनों की रिपोर्ट ही अब तक प्राप्त हुई है। 270 नमूनों की रिपोर्ट आज भी लंबित है। रिपोर्ट आने में हो रही देरी नासिक में स्वतंत्र सरकारी प्रयोगशाला न होने के कारण सभी सैंपल छत्रपति संभाजीनगर की प्रयोगशाला में भेजे जाते हैं, जहां मैनपावर की कमी के कारण रिपोर्ट आने में भारी देरी हो रही है।
दूध और दुग्धजन्य पदार्थों के 118 नमूनों की जांच की गई, जिसमें से 15 नमूने कम गुणवत्ता के और 5 नमूने पूरी तरह अप्रमाणित पाए गए। सबसे गंभीर बात यह है कि अप्रमाणित पाए गए पनीर के सैंपल्स में ‘मिल्क फैट’ की जगह ‘वेजिटेबल ऑयल का फैट’ मिलाया गया था। इसके अलावा रवा, मैदा, बेसन और भगर जैसे खाद्य पदार्थों के 92 नमूनों में से 3 कम गुणवत्ता के और 4 अप्रमाणित पाए गए हैं। लेकिन अभी तक कार्रवाई नहीं की जा सकी है।
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समय पर नहीं मिल पा रही लैब रिपोर्ट
नासिक संभाग के नागरिकों को शुद्ध खाद्य पदार्थ मिल सके, इसके लिए मुंगसरे में एक अत्याधुनिक अन्न परीक्षण प्रयोगशाला का प्रोजेक्ट हाथ में लिया गया था, इसे राज्य की एक महत्वपूर्ण लैब माना जा रहा है। लेकिन ठेकेदार को समय पर भुगतान न होने के कारण इसका निर्माण कार्य बेहद कछुआ गति से चल रहा है और काम अब भी अधूरा है। बिना आधिकारिक लैब रिपोर्ट के दोषियों पर दंडात्मक या अदालती कार्रवाई नहीं की जा सकती।
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मिलावट खोर उठा रहे नियम का गैरफायदा
इसका फायदा उठाकर मिलावटखोर लंबे समय तक कानून के शिकंजे से बचे रहते हैं। रिपोर्ट महीनों देरी से आने के कारण कानूनी सबूत कमजोर हो जाते हैं। कई बार संबंधित दूषित खाद्य पदार्थ तब तक बाजार में बिक चुके होते हैं, जिससे सीधे ग्राहकों की सेहत को खतरा पैदा होता है। कार्रवाई में ढिलाई के कारण कानून का खौफ खत्म हो रहा है और मिलावटखोरों का मनोबल बढ़ रहा है। अन्न सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे एफडीए की छापेमारी का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।
सहायक आयुक्त मंगेश माने ने बताया की मिलावटखोरों के खिलाफ हमारी कार्रवाई लगातार जारी है। नमूनों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण कुछ रिपोर्ट्स आने में देरी हो रही है, लेकिन जैसे ही प्रयोगशालाओं से रिपोर्ट प्राप्त होगी, संबंधितों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा कानून के तहत बेहद कठोर कार्रवाई की जाएगी।
