कॉन्सेप्ट फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Nanded Politics: नांदेड़-वाघाला महानगरपालिका चुनाव की आहट ने मराठवाड़ा की राजनीति में उबाल ला दिया है। यह चुनाव केवल नगरसेवकों को चुनने का जरिया नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, सांसद रवींद्र चव्हाण और प्रताप पाटिल चिखलीकर जैसे कद्दावर नेताओं के लिए साख का सवाल बन गया है। पूर्व नगरसेवकों के पाला बदलने और नए गठबंधन बनने से नांदेड़ की सियासी जमीन पर इस बार त्रिकोणीय संघर्ष के आसार नजर आ रहे हैं।
2017 के चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण के नेतृत्व में पार्टी ने 81 में से 73 सीटें जीतकर एकतरफा वर्चस्व स्थापित किया था। तब भाजपा मात्र 6 सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन अब समय बदल चुका है। अशोक चव्हाण खुद भाजपा में हैं और उनके साथ पूर्व महापौर शीला भवरे समेत दर्जनों पूर्व नगरसेवकों ने भाजपा का दामन थाम लिया है। हालांकि, हालिया लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत ने भाजपा को सतर्क कर दिया है। अशोक चव्हाण अब अपनी चुनावी कुशलता से मतदाताओं के मन में भाजपा के प्रति विश्वास जगाने की कोशिश कर रहे हैं।
2012 के चुनाव में 11 सीटें जीतकर चौंकाने वाली एमआईएम 2017 में खाता भी नहीं खोल सकी थी। लेकिन इस बार पार्टी फिर से उत्साहित है। कांग्रेस के 10 पूर्व नगरसेवकों, जिनमें दो पूर्व उपमहापौर अब्दुल शमीम और मोहम्मद मसूद खान शामिल हैं, ने एमआईएम का दामन थाम लिया है। इस दलबदल ने एक बार फिर पुराने मुद्दे को हवा दे दी है। कांग्रेस और राकांपा (अजीत पवार गुट) ने आरोप लगाया है कि एमआईएम फिर से भाजपा की ‘बी-टीम’ के रूप में काम कर रही है ताकि धर्मनिरपेक्ष वोटों का बंटवारा किया जा सके।
भाजपा के वरिष्ठ नेता अशोक चव्हाण ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा और एमआईएम का कोई आंतरिक संबंध नहीं है। चव्हाण ने विधायक प्रताप पाटिल चिखलीकर को खुली चुनौती देते हुए कहा, “यदि विपक्ष में दम है, तो वे अपने कार्यकर्ताओं को भाजपा में जाने से रोक कर दिखाएं।” उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों के पास जनता के बीच जाने के लिए कोई ठोस विकास मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे केवल आरोपों की राजनीति कर रहे हैं।
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नांदेड़ की राजनीति में अशोक चव्हाण और प्रताप पाटिल चिखलीकर की प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है। चिखलीकर, जो पहले भाजपा में थे और अब राकांपा (अजीत पवार) के विधायक हैं, चव्हाण के भाजपा में आने के मुखर विरोधी रहे हैं। चिखलीकर और सांसद रवींद्र चव्हाण ने संयुक्त रूप से हमला बोलते हुए कहा कि अशोक चव्हाण को अपनी पार्टी में प्रत्याशी नहीं मिल रहे, इसलिए वे कांग्रेस के लोगों को तोड़ रहे हैं। चिखलीकर ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि चव्हाण भाजपा को ‘हरे रंग’ में रंगने की कोशिश कर रहे हैं।
विधानसभा चुनाव में महायुति की सफलता से उत्साहित भाजपा अब नांदेड़ मनपा पर कब्जा जमाना चाहती है। दूसरी ओर, कांग्रेस अपनी पुरानी पकड़ बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। एमआईएम की मौजूदगी मुस्लिम और दलित बहुल क्षेत्रों में निर्णायक साबित हो सकती है। आरोप-प्रत्यारोपों के इस दौर में नांदेड़ की जनता विकास को चुनेगी या दलबदलुओं को, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, नांदेड़ की गलियों में चुनावी चर्चाएं अपने चरम पर हैं और हर दल अपनी गोटियां सेट करने में जुटा है।
-नवभारत के लिए हाफिज शेख की रिपोर्ट