‘छोटा मटका’ की हालत नाजुक, बाघ के फैंस की गुहार के बाद हाई कोर्ट लिया स्वयं संज्ञान
Nagpur News: ताडोबा के चर्चित बाघ 'छोटा मटका' की बिगड़ती हालत पर हाई कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया। फैंस की चिंता और इलाज में लापरवाही को लेकर कोर्ट ने जनहित याचिका स्वीकार की।
- Written By: आकाश मसने
ताडोबा का बाघ छोटा मटका (सोर्स: सोशल मीडिया)
Tadoba Tiger Chhota Matka Health: ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में अपनी बादशाहत कायम करने वाले प्रसिद्ध बाघ ‘छोटा मटका’ की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है जिससे उसके प्रशंसक गहरी चिंता में डूब गए हैं। उपचार में कथित टालमटोल के चलते प्रशंसकों ने सीधे राज्य सरकार को ई-मेल भेजकर ‘छोटा मटका’ की सेहत पर गंभीरता से ध्यान देने की मांग की है। इस संदर्भ में समाचार पत्र में छपी खबर पर स्वयं संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया। खबर को जनहित याचिका के रूप में प्रेषित करने के लिए हाई कोर्ट ने अधि। वाईएन सांबरे को अदालत मित्र के रूप में नियुक्त किया। साथ ही एक सप्ताह के भीतर याचिका कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
कई बार जान पर बन आई
पिछले कुछ सालों में ‘छोटा मटका’ ने अपनी बहादुरी और पर्यटकों से सहजता के कारण सबका दिल जीत लिया है। अपने अधिकार क्षेत्र पर राज करने की उसकी प्रवृत्ति, किसी को भी इसमें घुसने न देने का बाना और दूसरों द्वारा प्रयास करने पर तुरंत अपनी जगह दिखाने की उसकी निडरता ने उसे काफी कम समय में ही लोकप्रिय बना दिया है। लेकिन प्रशंसकों की तरह उसके दुश्मन भी हैं और ऐसे दुश्मनों का सामना करते हुए ‘छोटा मटका’ की जान पर कई बार बन आई है।
मटकासुर का वंशज है
छोटा मटका’ प्रसिद्ध बाघिन ‘छोटी तारा’ और शक्तिशाली बाघ ‘मटकासुर’ का वंशज है। उसने ‘मोगली’ और ‘बजरंग’ जैसे अन्य प्रभावशाली बाघों से मिली चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है और एक विशाल क्षेत्र पर अपना साम्राज्य स्थापित किया है। उसका मुक्त विचरण अलिझंझा से निमढेला तक फैला हुआ है।
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हाल ही में ‘छोटा मटका’ की ताडोबा-अंधारी व्याघ्र प्रकल्प के बफर क्षेत्र में आवास के लिए ‘ब्रह्मा’ नामक बाघ से भीषण लड़ाई हुई थी। इस लड़ाई में ‘ब्रह्मा’ की मौत हो गई, जबकि ‘छोटा मटका’ गंभीर रूप से घायल हो गया था। उसके पैर में बड़ा घाव हो गया था जिससे लगातार खून बह रहा था। पर्यटकों ने वन विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी थी लेकिन तब उपचार की बजाय उसे प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया गया था।
