नवभारत संवाद में पहुंचे नागपुर कानून विशेषज्ञ (फोटो नवभारत)
Nagpur Legal experts Advice: तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस दौर में कानूनी शोध और पुराने फैसलों का अध्ययन करना आज के युवाओं में कम होता जा रहा है। यह धातक है। दस्तावेज तो एआई की बदौलत रख सकते हैं, लेकिन दलील पेश करना मुश्किल है। जज के सामने एंगल रखना मुमकिन नहीं होता, क्योंकि युवा अपने दिमाग (स्ट्रेच) पर जोर नहीं दे रहे हैं। दिमाग पर जोर देने से क्रिटिकल एनालिसिस नहीं हो पाता। एआई के चक्कर में दिमाग का इस्तेमाल घटता चला जा रहा है, यूथ के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।
वकालत का पेशा ऐसा है, जो समाज में मान-सम्मान देता है। इसके लिए जिंदगी भर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। आरंभ तो कठिनाइयों की ‘खाई’ है। इसे जो पार कर लेता है, वहीं पेशे में नाम कमाता है। युवाओं को केवल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट नजर आता है, जबकि जरूरत यह है कि वे नीचे से मेहनत करें। बेसिक को समझे और तब ऊपरी अदालतों में जाएं। यह ‘कोर्ट मंत्रा’ उन्हें समझना होगा इसी प्रकार आज कोर्ट भी खुद को एडवांस कहता है, लेकिन हकीकत यह है कि बिल्डिंग छोड़ दे, तो कम्प्यूटर, कनेक्टिविटी बहुत ही खराब है। इस पर बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है। सुनाई के दौरान लिंक फेल होना आम है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के इतर अन्य कोर्ट के हालत आज भी काफी खराब हैं। उक्त विचार शहर के विभिन्न अदालतों में कार्यरत वकीलों ने व्यक्त किए।
‘नवभारत-नवराष्ट्र’ संवाद में उपस्थित हुए वकीलों ने कहा कि इस पेशे में ‘पेशेंस’ सबसे महत्वपूर्ण है। 3-4 वर्ष की कड़ी मेहनत और वरिष्ठों के सहयोग से ही युवा मार्ग में लगते हैं। नागपुर में हर वर्ष लगभग 500 युवा वकील पेशे में आ रहे हैं। 50 लाख की आबादी में महज 7500 ही वकील हैं। ‘पहली पीढ़ी के वकीलों के सामने अवसर और चुनौतियां’ विषय पर आयोजित इस चर्चा में शहर के दिग्गज वकीलों ने डिजिटल क्रांति के फायदों और वकालत के बदलते स्वरूप पर मंथन किया।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अतुल पांडे ने कहा कि वकिली में ‘हार्ड वर्क, हार्ड वर्क और हार्ड वर्क’ ही एकमात्र मूलमंत्र है। ७०% जिम्मेदारी वरिष्ठ वकीलों की भले ही हो, लेकिन 3०% जिम्मेदारी नवोदितों की भी होती है। पहले कनिष्ठ वकील वरिष्ठों से चर्चा के लिए रात तक रुकते थे, लेकिन आज वे घड़ी देखकर काम करने लगे हैं, जिससे सफलता का ग्राफ गिर रहा है। आईए अपनाएं, परंतु पुस्तक का सहारा अवश्य लें। दिमाग को स्ट्रेच देना ही पड़ेगा।
धर्मादाय आयुक्त बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल ठाकरे यह व्यवसाय शून्य निवेश का है। दिमाम और बेहतन ही इस पेशे में सफलता की कुंजी है। आज के युवा इन दोनों चीजों से भाग रहे हैं। एआई उन्हें सफलता नहीं दिला सकती। जज के सामने खड़े होने के लिए उन्हें अपडेट रहना अहम है। दुर्भाग्य से नवोदितों में पढ़ने की पर्याप्त आदत नहीं बची है। इस कारण उन्हें बदलते कानूनों और न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए महत्वपूर्ण प्रेक्षणों की जानकारी नहीं होती।
लेबर कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निनाद आलमेलकर ने बताया कि वकालत में केवल डिग्री से अधिक ‘प्रेजेंटेशन स्किल’ (प्रस्तुतीकरण कौशल) महत्वपूर्ण है। कई बार मैं नवोदितों के आत्मविश्वास और विषय पर पकड़ से प्रभावित होकर उन्हें खुद अपनी केस चलाने के लिए देता हूँ। इसी से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। अच्छे वरिष्ठ के साथ मेहनत करना आज के युवाओं के लिए काफी महत्वपूर्ण है। सबसे पहले तो उन्हें अदालतों का मैनर्स आना चाहिए। शार्ट टर्म की चाहत नहीं होनी चाहिए।
MAT बार एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र ठोंबरे ने कहा कि जो नवोदित वकील अध्ययन के बजाय केवल एआई के भरोसे हैं, उनका भविष्य में नुकसान तय है। तकनीक जानकारी दे सकती है, लाजिक नहीं। वकालत में शॉर्टकट नहीं चलता, यहां केवल ‘लॉजिक’ और ‘लेबर’ ही चलता है। युवाओं को सही मार्गदर्शन करना और उन्हें सही रास्ते पर लाना वरिष्ठ वकीलों का कर्तव्य है। इसलिए प्रैक्टिस शुरू करते वक्त एक अच्छे वरिष्ठ की खोज युवाओं को करनी चाहिए।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य उदय डबले ने बताया कि न्यायालय में नवोदितों के बैठने के लिए जगह और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। वरिष्ठों के साथ बैठने से ही वकील तैयार होता है। ‘कोर्ट मंत्रा’ जैसे उपक्रमों के माध्यम से उन्हें न्यायालयीन पद्धति सीखनी चाहिए। बिल्डिंगें बन रही है, लेकिन बेसिक सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। छोटी अदालतों की स्थिति और भी दयनीय है।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य मोहित खजांची ने कहा कि अब वकालत केवल कोर्ट रूम तक सीमित नहीं है। कंपनियों में भी वकीलों के लिए असीम अवसर पैदा हुए हैं। लाखों रुपये का पैकेज वकाल करने वालों को मिल रहा है। इससे प्रेफेशन में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। युवा नौकरी पर जोर देते हैं, क्योंकि शुरू से ही उन्हें तगड़ा वेतन मिलने लगता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि विधी क्षेत्र की सीमाएं अब काफी विस्तृत हो गई हैं।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य जेमिनी कासट ने कहा कि युवा वकील जानकारी को ‘क्रॉस-चेक’ नहीं करते, जिससे वे पीछे रह जाते हैं। युवाओं के समाने एक बड़ी चुनौती यह है कि अच्छे मार्गदर्शक कैसे खोजे। एक अच्छा मार्गदर्शक ही युवाओं के जीवन को गढ़ सकता है। युवाओं को और अधिक आकर्षित करना है, तो उनके लिए स्टाइपन्ड (मानधन) देने की प्रवृत्ति को बढ़ाने की जरूरत है। कम से कम युवा अपने रोज का खर्च निकाल सके, तो उनकी रुचि पेशे में बढ़ेगी। आज इसकी काफी कमी महसूस होती है। अन्य क्षेत्रों में स्टाइपंड देने की व्यवस्था अच्छी है।
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हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य विजय मोरांडे ने बताया कि डिजिटलाइजेशन के कारण तर्कसंगत विचार शक्ति कम हो रही है। गूगल और एआई के कारण रेडीमेड जानकारी आसानी से मिल जाती है, जिससे नए वकील खुद के दिमाग से सोचने या गहराई से अध्ययन करने का कष्ट नहीं उठाते। यह भविष्य के लिए बेहतर संकेत नहीं है। बेहतर होगा वे अपने दिमाग पर ज्यादा भरोसा करें। कोर्ट में एआई नहीं चलता और न ही जज एआई पर भरोसा करते हैं।
अधिवक्ता आस्था शर्मा ने बताया कि मेरे पिता चाहते थे कि मैं अधिकारी बनूं, लेकिन मैंने वकालत चुनी। पहले दिन से ही कोर्ट में युक्तिवाद करने पर जोर दिया। शुरुआती दिनों का वह अभ्यास और लिए गए कष्ट ही आज मेरी सफलता का आधार हैं। वकालत के पेशे में रोज कुछ नया सीखने को मिलता है। इसमें रुचि लेकर आगे बढ़ना महत्वपूर्ण है। युवा चाहे तो एक अच्छा करियर बना सकते हैं। यह जरूर है कि आरंभिक दिनों में स्ट्रगल काफी है।
जिला बार एसोसिएशन की उपाध्यक्ष उषा गुजर ने कहा कि आज के वकीलों को सीधे हाई कोर्ट के ग्लैमर से आकर्षित होते हैं। फिल्मों में देखकर वे उसी तरह व्यवहार भी करते हैं। लेकिन वास्ताविकता इसके विपरीत है। वकालत की असली नींव ‘कनिष्ठ न्यायालय’ में ही रखी जाती है। ट्रायल कोर्ट, तहसील, जिला कोर्ट के अनुभव के बिना प्रक्रिया और बारीकियों को समझना असंभव है। आरंभिक दिनों में बेस मजबूत करने के लिए युवाओं को कार्यप्रणाली जाननी चाहिए।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की सदस्य प्रीती राणे ने कहा कि महिला वकीलों की सफलता उनकी डिग्री पर नहीं, बल्कि उनके समर्पण और चुनौतियों से लड़ने पर निर्भर करती है। जिन्होंने शुरुआती दौर में संयम दिखाया, वे ही आज इस क्षेत्र में मजबूती से पैर जमा पाई हैं। महिलाओं के लिए यह पेशा काफी शानदार है।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य मकरंद राजकोंडावार ने बताया कि बड़ी यूनिवर्सिटी की डिग्रियां आपको कोर्ट के दरवाजे तक ला सकती हैं, लेकिन वहां टिकने के लिए ट्रायल कोर्ट का अनुभव ही काम आता है। जिसे जमीनी कोर्ट की पहचान है, वही वास्तव में सफल वकील बनता है। ड्राफटिंग, आर्डर को पढ़ना नियमित कार्य है। इस पर गंभीर मंथन करना चाहिए।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की पूर्व कार्यकारी सदस्य प्रियंका अरबट ने कहा कि नई महिला वकीलों को सफल होने के लिए वकालत को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। इस व्यवसाय में व्यक्तिगत कारणों या रियायतों के लिए कोई स्थान नहीं है। समर्पण और सातत्य ही सफलता का एकमात्र राजमार्ग है। यहां बहानेबाजी नहीं चलती। निरंतरता काफी अहमियत रखती है। मुवक्किलों को वकीलों पर पूर्ण भरोसा होता है, उस पर खरा उतरना वकीलों का काम है।