नागपुर SBL फैक्ट्री विस्फोट: हाई कोर्ट सख्त, 5 अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
Nagpur High Court: नागपुर हाई कोर्ट ने एसबीएल कंपनी विस्फोट मामले में एमडी संजय चौधरी और सीईओ सहित 5 अधिकारियों की जमानत खारिज कर दी है। इस हादसे में 26 मजदूरों की जान चली गई थी।
- Written By: रूपम सिंह
हाई कोर्ट का सख्त रुख (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nagpur Justice Rajnish Vyas: कलमेश्वर थाना क्षेत्र अंतर्गत राउलगांव स्थित एसबीएल कंपनी में हुए भीषण विस्फोट मामले में हाई कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। न्यायाधीश रजनीश व्यास ने कंपनी के प्रबंध निदेशक (एमडी) संजय चौधरी और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) आलोक चौधरी सहित 5 प्रमुख अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इस दर्दनाक कारखाने हादसे में 22 महिलाओं सहित कुल 26 बेगुनाह मजदूरों की जान चली गई थी। संजय चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने पैरवी की।
जेल जाने की तलवार लटकी
न्या रजनीश व्यास की पीठ ने स्पष्ट किया कि खतरनाक उद्योगों में वैधानिक सुरक्षा नियमों की घोर अनदेखी को सामान्य ‘चूक’ नहीं माना जा सकता। इसके बाद संजय चौधरी (मैनेजिंग डायरेक्टर), आलोक चौधरी (सीईओ/डायरेक्टर), केदार अरविंद पाचपुत्रे (डिप्टी मैनेजर सेफ्टी), आलोक अवधिया (डायरेक्टर), श्रवण कुमार (डायरेक्टर) को भी जमानत देने से साफ इनकार कर दिया।
स्वतंत्र निदेशकों को मिली जमानत
हालांकि अदालत ने कंपनी के 3 स्वतंत्र निदेशकों सत्यवती पराशर, रवींद्र पोखर्णा और मनोज कुमार प्रसाद को सशर्त अग्रिम जमानत दे दी है। सत्यवती पराशर नेअदालतको बताया था कि वह ब्रेस्ट कैंसर (स्टेज-3) से गंभीर रूप से पीड़ित हैं और उनका इम्यून सिस्टम कीमोथेरेपी के कारण बेहद कमजोर हो चुका है। अदालत ने उनकी बीमारी और स्वतंत्र निदेशकों की सीमित कानूनी जवाबदेही (जब तक कि उनकी सीधी मिलीभगत साबित न हो) को ध्यान में रखते हुए उन्हें राहत दी।
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खौफनाक हादसा, कैसे बरती गई जानलेवा लापरवाही ?
- कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि यह खौफनाक हादसा 1 मार्च 2026 की सुबह लगभग 7 से 7.30 बजे के बीच कंपनी के शेड नंबर 16-बी (NONEL क्रिम्पिंग यूनिट) में हुआ था। पुलिस, विस्फोटक नियंत्रक और औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य निदेशालय (DISH) की जांच में कंपनी की भारी लापरवाही उजागर हुई है।
- विस्फोटकों का अवैध जमावड़ा: कंपनी ने तैयार विस्फोटकों को अगली प्रक्रिया या सुरक्षित मैगजीन में शिफ्ट करने के बजाय उसी बिल्डिंग में जमा होने दिया, जिससे एक छोटे विस्फोट ने भयानक रूप ले लिया।
- सुरक्षा उपकरणों की कमी: कारखाने में न तो ‘फायर ट्रेलर पंप’ थे और न ही फ्लेमप्रूफ सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे।
- अधिकारियों की कमी: नियम के अनुसार दो सुरक्षा अधिकारियों की जरूरत थी, लेकिन वहां सिर्फ एक (केंदार पाचपुत्रे) को नियुक्त किया गया था।
- मजदूरों की जान से खिलवाड़: जांच में सामने आया कि खतरनाक और विस्फोटक सामग्री को संभालने के लिए वहां काम करने वाले मजदूरों को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।
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पहले की चेतावनियों को किया गया नजरअंदाज
सरकारी वकील ने अदालत में कड़ा विरोध जताते हुए बताया कि 21 जून 2024 को भी DISH विभाग ने कंपनी का निरीक्षण कर सुरक्षा खामियों के संबंध में चेतावनी दी थी, लेकिन प्रबंधन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। आरोपियों पर नई भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 105 (गैर इरादतन हत्या), 125(a), 125(b) और 288 (विस्फोटक पदार्थों से लापरवाही) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
अदालत ने अपने फैसले में बचाव पक्ष की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि हादसे के वक्त डायरेक्टर वहां मौजूद नहीं थे या उन्हें इसकी ‘जानकारी’ नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि खतरनाक रसायनों का व्यवसाय करने वाली कंपनी में वैधानिक ड्यूटी का पालन न करना और पूर्व की चेतावनियों के बावजूद आंखें मूंदे रखना, यह दर्शाता है कि आरोपियों को ‘ज्ञान’ था कि उनकी इस लापरवाही से किसी की जान जा सकती है।
