नागपुर में पेट्रोल का हाहाकार! सरकारी दावे 'ऑल इज वेल', पंपों पर नो स्टॉक के बोर्ड, जानें क्राइसिस की असली वजह

Nagpur Petrol Shortage: नागपुर में पेट्रोल-डीजल का हाहाकार! 'नो स्टॉक' के बोर्ड और वाहनों की लंबी कतारें। प्रशासन के 'ऑल इज वेल' के दावे फेल। जानें क्यों सूखे पेट्रोल पंप और क्या थी असली वजह।
Nagpur faces acute petrol-diesel shortage as pumps go dry. Banking delays and RTGS issues cited as reasons, while citizens suffer in long queues despite admin's 'all is well' claim.
नागपुर में फ्यूल क्राइसिस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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No Stock Petrol Pumps Nagpur: नागपुर शहर में मंगलवार को पेट्रोल और डीजल की कथित ‘कमी नहीं’ होने के दावों की हवा उस वक्त निकल गई जब सुबह-सुबह अधिकांश पेट्रोल पंपों पर ‘नो स्टॉक’ के बोर्ड लटकते नजर आए। प्रशासन ‘ऑल इज वेल’ का राग अलापता रहा लेकिन सड़कों पर आम शहरवासी घंटों कतारों में खड़े होकर व्यवस्था की पोल खुलते देखते रहे। सवाल सीधा है कि अगर सब ठीक था तो पंप सूखे क्यों थे? अगर यही हाल रहा तो भविष्य में किसी भी छोटी बाधा से बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

सुबह की शुरुआत, अफरा-तफरी के साथ

मंगलवार की सुबह नागपुर के लिए किसी सामान्य दिन की तरह नहीं थी। जैसे ही लोग अपने रोजमर्रा के काम के लिए घरों से निकले उन्हें पेट्रोल पंपों पर ‘नो स्टॉक’ के बोर्ड दिखाई दिए। कुछ ही मिनटों में हालात बदल गए। जहां-जहां पेट्रोल उपलब्ध था वहां दोपहिया और चारपहिया वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं। स्कूल जाने वाले बच्चों के अभिभावक, ऑफिस जाने वाले कर्मचारी, ऑटो और कैब चालक, हर कोई परेशान नजर आया। शहर के कई हिस्सों में ट्रैफिक तक प्रभावित हुआ क्योंकि सड़कों के किनारे खड़े वाहनों की कतारें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं।

सोशल मीडिया ने लगाई आग

इस पूरे घटनाक्रम में सोशल मीडिया ने ‘आग में घी’ डालने का काम किया। जगह-जगह से वीडियो और मैसेज वायरल होने लगे। ‘पेट्रोल खत्म हो गया’, ‘कल से पूरी तरह बंद रहेगा’, ‘अगले 3 दिनों तक पेट्रोल नहीं मिलेगा’ जैसे संदेशों ने लोगों में घबराहट पैदा कर दी। परिणाम यह हुआ कि जिन लोगों को तत्काल जरूरत नहीं थी वे भी पेट्रोल पंपों पर पहुंच गए और टैंक फुल कराने लगे। इस मनोविज्ञान ने हालात को और बिगाड़ दिए।

जमीनी हकीकत कुछ और...

दोपहर होते-होते स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कई पंप पूरी तरह ड्राई हो गए और बिक्री बंद करनी पड़ी। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और जिलाधिकारी विपीन इटनकर को सामने आकर बयान देना पड़ा कि ‘शहर में ईंधन का पूरा स्टॉक उपलब्ध है, घबराने की जरूरत नहीं है।’ लेकिन यह बयान तब आया जब हालात पहले ही बेकाबू हो चुके थे। जिन पंपों पर सुबह तक ईंधन था वे भी लोगों की भीड़ के चलते खाली हो चुके थे। यानी एक तरफ प्रशासन ‘सब ठीक है’ कहता रहा दूसरी तरफ जमीन पर लोग घंटों लाइन में खड़े होकर इस दावे को झूठा साबित होते देखते रहे।

आखिर किल्लत क्यों हुई?

पेट्रोल पंप एसोसिएशन ने इस संकट के पीछे जो कारण बताया, वह और भी चौंकाने वाला है। उनके अनुसार...

  • एडवांस पेमेंट पॉलिसी के चलते पेट्रोलियम कंपनियों को पहले भुगतान करना पड़ता है।
  • शनिवार और रविवार को बैंक बंद होने से आरटीजीएस भुगतान नहीं हो सका।
  • इसके चलते कंपनियों ने सप्लाई रोक दी। मंगलवार को बैंक खुलने के बाद पेमेंट क्लियर हुआ।
  • तब जाकर टैंकर रवाना हुए और फिर पंपों पर सप्लाई शुरू हो सकी।
  • यानी पूरी व्यवस्था बैंकिंग सिस्टम पर टिकी हुई थी और 2 दिन की छुट्टी ने पूरे शहर को संकट में डाल दिया।

हलक से नहीं उतर रही ‘दलील’

शनिवार-रविवार की छुट्टी और आरटीजीएस क्लियर न होने की दलील आम लोगों के ‘हलक से नहीं उतर रही’ है। यह दलील सुनने में जितनी आसान लगती है उतनी ही संदिग्ध भी है। क्योंकि…

  • यह पहली बार नहीं था कि जब लगातार 2 दिन बैंक बंद रहे हों।
  • पहले कभी इस कारण से पूरे शहर में ‘नो स्टॉक’ की स्थिति नहीं बनी।
  • प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कोविड जैसी स्थिति के बयान के अगले ही दिन ऐसा क्यों हुआ?
  • क्या कंपनियों और पंप संचालकों के पास कोई बैकअप प्लान नहीं था?
  • क्या प्रशासन को पहले से इसकी जानकारी नहीं थी?

आम शहरवासी बना ‘फुटबॉल’

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा पिसा कौन? आम नागरिक। एक ओर प्रशासन अपनी सफाई देता रहा दूसरी ओर पेट्रोल पंप संचालक अपनी मजबूरी बताते रहे और तीसरी तरफ पेट्रोलियम कंपनियां अपनी नीतियों का हवाला देती रहीं लेकिन इन तीनों के बीच शहरवासी ‘फुटबॉल’ बनकर रह गए। इनमें से किसी को भी इस बात की चिंता नहीं कि हर दिन ऑफिस जाने वाला व्यक्ति देर से पहुंच रहा है। स्कूल बसें समय पर नहीं चल पा रहीं। रोज कमाने-खाने वाले लोगों की आमदनी पर असर पड़ रहा है।

दोपहर बाद राहत लेकिन देर से…

हालांकि दोपहर बाद शहर के कुछ पंपों पर ऑयल टैंकर पहुंचने शुरू हुए। धीरे-धीरे सप्लाई बहाल हुई और लोगों ने राहत की सांस ली। देर रात तक अधिकांश पेट्रोल पंपों पर स्थिति सामान्य होती नजर आई लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। लोगों के पेट्रोप पंपों पर खड़े-खड़े कई घंटे बर्बाद हो चुके थे। लोगों की दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो चुकी थी और सबसे बड़ी बात कि प्रशासन पर भरोसा कमजोर पड़ चुका था।

अफवाहें क्यों फैलीं? तय हो जवाबदेही

जब आधिकारिक सूचना समय पर नहीं मिलती तब अफवाहें ही ‘सच’ लगने लगती हैं। अगर प्रशासन सुबह ही स्पष्ट और प्रभावी तरीके से स्थिति बताता तो शायद इतनी अफरा-तफरी नहीं होती।

एक नजर में देखा जाए तो मंगलवार का दिन नागपुर के लिए एक चेतावनी की तरह है। इसने दिखा दिया कि सिस्टम कितना कमजोर है, समन्वय कितना खराब है और आम आदमी की प्राथमिकता कितनी कम है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि ‘ऑल इज वेल’ कह देना आसान है लेकिन जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल अलग थी। अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की जिम्मेदारी तय हो। साथ ही भविष्य के लिए ठोस योजना बनाई जाए।

सबसे जरूरी कि आम नागरिक को भरोसा दिलाया जाए कि अगली बार उसे इस तरह सड़कों पर भटकना नहीं पड़ेगा क्योंकि अगर ‘सब ठीक है’ तो फिर यह सवाल बार-बार उठेगा कि फिर पंप ड्राई क्यों?

  • नवभारत लाइव पर नागपुर से सतीश दंडारे की रिपोर्ट
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