हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
RTE Admission Distance Rule: नागपुर हाई कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत निजी बिना सहायता प्राप्त स्कूलों में प्रवेश को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने गुरुवार को सुनवाई के बाद स्पष्ट किया है कि बच्चों को उनके मौलिक अधिकार से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि स्कूल उनके घर से एक निश्चित दूरी के भीतर नहीं है। न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि निजी स्कूलों में 25% आरक्षित सीटों पर प्रवेश के लिए दूरी की सीमाओं को हटाया जाए।
याचिकाकर्ता आशीष फुलझले, अनिकेत कुत्तरमारे और अन्य द्वारा दायर एक जनहित याचिका में याचिकाकर्ताओं ने 12 फरवरी 2026 के उस सरकारी प्रस्ताव (जीआर) को चुनौती दी थी जिसमें पड़ोस के स्कूल की परिभाषा को केवल 1 किलोमीटर के दायरे तक सीमित कर दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि यह शर्त न केवल शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा 12(1)(c) के खिलाफ है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 21A का भी उल्लंघन करती है। अदालत ने यह भी पाया कि कई इलाकों में 1 किलोमीटर के भीतर कोई स्कूल उपलब्ध ही नहीं है जो कि शिक्षा अधिनियम के तहत सरकार की अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में विफलता को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान सरकार ने अपनी गलती सुधारने के लिए दूरी की सीमा को 1 से बढ़ाकर 3 किलोमीटर करने का प्रस्ताव दिया लेकिन अदालत ने इसे भी नाकाफी बताया। हाई कोर्ट का मानना है कि यदि 3 किलोमीटर के भीतर भी कोई निजी बिना सहायता प्राप्त स्कूल नहीं आता है तो दूरी की सीमा को और बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को उनके अधिकार का लाभ मिल सके।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि सरकार ने आवेदन करने की अंतिम तिथि बढ़ाकर 18 मार्च 2026 कर दी है। अदालत ने सरकार को 2 दिनों के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने और निजी स्कूलों के लिए दूरी की बाध्यता खत्म करने का निर्देश दिया है। साथ ही सरकार को अपनी प्रगति रिपोर्ट 16 मार्च 2026 तक अदालत में पेश करने का भी आदेश दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान दिलचस्प मोड़ तब आया जब अदालत ने याचिकाकर्ताओं के आचरण पर नाराजगी व्यक्त की। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष कुछ ऐसे दस्तावेज पेश किए थे जिनसे यह संकेत मिलता था कि बच्चे 1 किलोमीटर के भीतर स्कूल न होने के कारण पहली कक्षा में प्रवेश नहीं पा रहे हैं।
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हालांकि सरकारी वकील ने बताया कि उनमें से एक बच्ची केवल 4 साल की थी और वह जूनियर केजी के लिए आवेदन कर रही थी। कोर्ट ने इसे अदालत को गुमराह करने की कोशिश मानते हुए याचिकाकर्ताओं पर 25000 रुपये का जुर्माना लगाया है। यह राशि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की हाई कोर्ट शाखा में ‘पब्लिक वेलफेयर अकाउंट’ में जमा करने का निर्देश दिया गया है।
अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि RTE अधिनियम का उद्देश्य समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। निजी स्कूलों की यह जिम्मेदारी पूर्ण और बिना किसी शर्त के है कि वे अपने यहाँ उपलब्ध सीटों का 25% हिस्सा इन बच्चों के लिए आरक्षित रखें।