अतिक्रमणकारियों को हाईकोर्ट का सख्त संदेश: सार्वजनिक जमीन खाली कराने के आदेश में बदलाव से साफ इनकार

Nagpur NIT Encroachment Case: नागपुर में एनआईटी भूमि अतिक्रमण मामले में हाई कोर्ट ने पूर्व आदेश बदलने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ किया कि अवैध कब्जाधारियों को संरक्षण या सहानुभूति नहीं दी जाएगी।
High Court's Stern Message to Encroachers: Categorical Refusal to Modify Orders for Eviction from Public Land
नागपुर एनआईटी अतिक्रमण मामला, हाई कोर्ट आदेश,(प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Illegal Construction Dispute: नागपुर एनआईटी की सार्वजनिक भूमि और अपनी निजी जमीन से अतिक्रमण हटाने की मांग करते हुए पुष्पा गुप्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इससे पहले 9 अप्रैल 2026 को अदालत ने मामले का निपटारा कर दिया था क्योंकि एनआईटी ने अदालत को आश्वासन दिया था कि वह 6 सप्ताह के भीतर अवैध निर्माण हटा देगा।

याचिका में अब किरायेदारों की ओर से अर्जी दायर कर अतिक्रमण हटाने के लिए दिए गए आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई है। अजर्जी पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश उर्मिला जोशी फालके और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने सार्वजनिक भूमि पर हुए अवैध निर्माण और अतिक्रमण को हटाने के अपने पूर्व आदेश को वापस लेने या उसमें बदलाव करने से साफ इनकार कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि अवैध अतिक्रमणकारी के माध्यम से अधिकार जताने वाले किसी भी व्यक्ति को अदालत से कब्जा बनाए रखने के लिए कोई सहानुभूति नहीं मिलेगी। किरायेदारों ने किया अदालत का रुख अदालत के आदेश के बाद एनआईटी ने कार्रवाई करते हुए विवादित परिसर में मौजूद कुछ लोगों को 24 घंटे के भीतर जगह खाली करने का नोटिस जारी किया।

ये लोग साल 2024 से वहां व्यवसाय कर रहे थे। इन व्यवसायियों ने खुद को मामले के 'प्रतिवादी संख्या 11' का किरायेदार बताते हुए अदालत में हस्तक्षेप याचिका दायर की। उन्होंने अदालत से 9 अप्रैल के आदेश को वापस लेने या जगह खाली करने के लिए कुछ और समय देने की गुहार लगाई थी। हाई कोर्ट ने इन याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया।

उपयुक्त प्राधिकारी के पास शिकायत की छूट

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने की कानूनी कार्यवाही को निजी किरायेदारी के विवादों में नहीं बदला जा सकता और नहीं अवैध कब्जे को जारी रखने के लिए रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि अदालत ने उन्हें 24 घंटे के बेदखली नोटिस के खिलाफ कानून के अनुसार उपयुक्त प्राधिकारी के पास अपनी शिकायत लेकर जाने की छूट दी है।

फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें की गई स्पष्ट

संदिग्ध दावों पर कोई अधिकार नहीं अदालत ने कहा कि जिन व्यक्त्तियों (प्रतिवादी संख्या 5 से 11) ने इन लोगों को कथित तौर पर किराये पर रखा था, उन व्यक्तियों कर संपत्ति पर अपना दावा और उनके दस्तावेज ही जांच में बेहद संदिग्ध पाए गए है।

इसलिए उनके माध्यम से आए किरायेदार किसी स्वतंत्र या बेहतर अधिकार का दावा नहीं कर सकते आजीविका का बहाना नहीं चलेगा कोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि आजीविका या निवेश से जुड़ी सहानुभूति का हवाला देकर सार्वजनिक प्राधिकरण की भूमि पर किए गए अवैध निर्माण को हटाने की आवश्यकता को दरकिनार नहीं किया जा सकता अंतिम आदेश वापस लेने की शर्ते अदालत ने बताया कि किसी अंतिम आदेश को वापस लेने का अधिकार तभी इस्तेमाल होता है जब आदेश धोखाधड़ी से लिया गया हो, न्याय में कोई भारी चूक हुई हो या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो। चूंकि वह मामला सार्वजनिक जमीन से अतिक्रमण हटाने का है न कि किरायेदारी तय करने का, इसलिए आदेश वापस लेने का कोई आधार नहीं बनता।

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