हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
Central Ammunition Depot Wardha: नागपुर हाई कोर्ट ने वर्धा जिले के सेंट्रल एम्युनिशन डिपो (सीएडी) पुलगांव के आसपास रहने वाले किसानों और भूस्वामियों को एक ऐतिहासिक राहत प्रदान की। कोर्ट ने 15 अप्रैल 2002 को जारी उस रक्षा अधिसूचना को निरस्त कर दिया, जिसके तहत डिपो के 2,000 गज के दायरे (क्लियरेंस जोन) में नागरिकों द्वारा किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी।
वर्धा जिले की देवली तहसील निवासी किसान और व्यवसायी इवान सिंह और शैलेश वानखेड़े ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय ने ‘वर्क्स ऑफ डिफेंस एक्ट, 1903’ के तहत 15 अप्रैल 2002 को विशेष आदेश जारी कर इस क्षेत्र में भूमि के उपयोग और निर्माण पर सख्त पाबंदियां लगा दी थीं।
सेंट्रल एम्युनिशन डिपो (सीएडी) प्रशासन और वर्धा के जिलाधिकारी ने फिर से नोटिस जारी कर स्थानीय आबादी को 2,000 गज के सुरक्षा क्षेत्र में निर्माण कार्य करने से सख्ती से मना किया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने अदालत से कहा कि पाबंदियां लगाने के बावजूद सरकार ने कानून के अनुसार प्रभावित भूस्वामियों को हर्जाना या मुआवजा देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। किसानों ने अपनी जमीन के अधिग्रहण या मुआवजे के लिए जो आवेदन दिए थे, उनका भी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 1903 के अधिनियम की धारा 9 के तहत सरकार को अधिसूचना जारी होने के 18 महीने से लेकर अधिकतम 3 साल के भीतर जांच पूरी करके मुआवजे की घोषणा करनी होती है।
चूंकि सरकार ने पिछले दो दशकों में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया और न ही कोई मुआवजा दिया, इसलिए बिना मुआवजे के इन प्रतिबंधों को अनिश्चितकाल तक जारी रखना मनमाना, अन्यायपूर्ण और अनुचित है। अदालत ने माना कि 2002 की यह घोषणा स्वतः निरस्त हो चुकी है। इसी आधार पर न्यायालय ने 15 अप्रैल 2002 के विशेष आदेश और वर्ष 2023 व 2001 में जारी किए गए निर्माण-रोधी संचार और नोटिस को रद्द कर दिया।
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सुरक्षा कारणों और निरंतरता को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने अपने इस रद्दीकरण के आदेश को तुरंत लागू न करके इसे 22 सितंबर 2026 तक के लिए स्थगित रखा है। न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह छूट दी है कि वह इस 6 महीने की अवधि के भीतर नए सिरे से सर्वेक्षण और जांच करके कानून के तहत एक नई अधिसूचना जारी कर सकती है।
हालांकि, अदालत ने सख्त निर्देश दिया है कि नई अधिसूचना जारी करने के बाद सरकार को 1903 के अधिनियम के अनुसार तय समयसीमा के भीतर लोगों को मुआवजा देने की कानूनी प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होगा।