रेलवे विज्ञापन ई-नीलामी मामला: नागपुर हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका, देरी और कानूनी सीमाओं का दिया हवाला
Railway E-Auction: नागपुर हाई कोर्ट ने रेलवे विज्ञापन साइटों की ई-नीलामी विवाद में एसएस कम्युनिकेशन्स की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने देरी और तकनीकी मामलों में सीमित हस्तक्षेप को फैसला का आधार बताया।
- Written By: अंकिता पटेल
नागपुर हाई कोर्ट, रेलवे ई-नीलामी, (सोर्स सोशल मीडिया)
Railway E-Auction Tender Dispute: नागपुर हाई कोर्ट ने रेलवे विज्ञापन साइट्स की ई-नीलामी से जुड़े विवाद में एसएस कम्युनिकेशन्स एडवर्टाइजमेंट प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया। न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने में की गई देरी और तकनीकी मामलों में रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं के कारण उन्हें राहत नहीं दी जा सकती।
याचिकाकर्ता एसएस कम्युनिकेशन्स का दावा था कि 27 दिसंबर 2025 को आयोजित ई-नीलामी में उन्हें सबसे बड़ी बोली लगाने वाला घोषित किया गया था और विज्ञापनों के प्रदर्शन के लिए साइट्स आवंटित की गई थीं। कंपनी के अनुसार 30 दिसंबर 2025 को मूल्यांकन के बाद सक्षम प्राधिकारी ने उनके पक्ष में टेंडर देने का निर्णय लिया था और 27 जनवरी 2026 तक रेलवे की वेबसाइट पर टेंडर का स्टेटस दिख रहा था।
प्रक्रिया केवल ठोस कारणों से हो सकती है रद्द
कंपनी का आरोप था कि बिना पुरानी नीलामी को रद्द किए, रेलवे ने मनमाने और दुर्भावनापूर्ण तरीके से उसी साइट के लिए नया टेंडर जारी कर दिया। याचिकाकर्ता ने अदालत से 27 जनवरी 2026 को हुई नई ई-नीलामी प्रक्रिया को रद्द करने और अपने पक्ष में आवंटन पत्र जारी करने की मांग की थी।
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अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कंपनी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के गोल्डन फूड प्रोडक्ट्स इंडिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) मामले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि नीलामी प्रक्रिया को केवल धोखाधड़ी या मिलीभगत जैसे ठोस कारणों से ही रद्द किया जा सकता है।
अन्य पक्ष को दे दिया वर्क ऑर्डर
उप सॉलिसिटर जनरल शुकुल ने अदालत को बताया कि वेबसाइट पर जो बिक्री का स्टेटस था उसके साथ स्पष्ट रूप से बिड शीट पर हस्ताक्षर नहीं हुए की टिप्पणी भी जुड़ी थी। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि 30 दिसंबर 2025 को मूल्यांकन के दिन ही एक तकनीकी खराबी के कारण बिड शीट पर हस्ताक्षर नहीं हो सके जिसके चलते बोली रद्द कर दी गई और पुराना टेंडर खत्म कर दिया गया। इसके बाद 9 जनवरी 2026 को दोबारा टेंडर निकाला गया और 27 जनवरी 2026 को एक अन्य पक्ष को वर्क ऑर्डर दे दिया गया।
तकनीकी मामले में दखल से इनकार
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत तकनीकी खराबी जैसे विवादित तथ्यों की गहराई में जाकर जांच नहीं कर सकती क्योंकि इसे साबित करने के लिए साक्ष्य की आवश्यकता होती है।
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कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को 10 जनवरी 2026 को ही नए टेंडर जारी होने के बारे में पूरी जानकारी मिल गई थी क्योंकि उन्होंने खुद उसी दिन रेलवे को ईमेल भेजकर नई प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी और स्पष्टीकरण मांगा था।
इसके बावजूद कंपनी ने 29 जनवरी 2026 तक याचिका दायर करने का इंतजार किया। यह याचिका तब दायर की गई जब 27 जनवरी को पहले ही तीसरे पक्ष को टेंडर आवंटित हो चुका था।
