हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
HC Nagpur Bench Noise Pollution: नागपुर के सिविल लाइंस में चल रहे लॉन्स नियमों की अनदेखी की जा रही है। इस पर हाई कोर्ट सख्त है और कड़ी नाराजगी जताई है। प्रशासन, खासकर महानगर पालिका (मनपा) और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (एमपीसीबी) को हिदायत दी है कि इन लॉन्स की जांच करें और उचित कदम उठाएं।
हाई कोर्ट की नाराजगी बिल्कुल जायज है लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इतनी कड़ी फटकार के बाद भी क्या मनपा और एमपीसीबी कठोर कदम उठाएंगे? संदेह इसलिए है कि इन दोनों विभागों की नाक के नीचे नियमों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। एक मंजिल की बिल्डिंग 4 मंजिल और 4 मंजिल की बिल्डिंग 6 मंजिल तक पहुंच जा रही है। पार्किंग नहीं होने के बाद भी ट्रैफिक विभाग से इन्हें एनओसी मिल जाता है और आसपास रहने वाले बड़े ओहदे के अधिकारी मन मसोस कर रह जाते हैं।
हालांकि हाई कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण को गंभीरता से लिया है, लेकिन क्षेत्र में रहने वाले तमाम प्रकार के ‘प्रदूषण’ से त्रस्त हैं। घरों में रहना उनके लिए मुश्किल सा हो गया है। जिस दिन कार्यक्रम होता है, उस दिन उनकी रातों की नींद उड़ जाती है क्योंकि रातभर उन्हें पार्किंग की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
ऊंची-ऊंची आवाज में रातभर लोगों की बातों से संकट का सामना करना पड़ता है। सुबह उठते ही आसपास के क्षेत्र में गंदगी का ढेर अलग से परेशान करता है। यह सही बात है कि अधिकांश दर्जेदार अधिकारी सरकारी आवास में रहते हैं, लेकिन लॉन्स के इन कृत्यों के कारण उनका पूरा परिवार परेशान होता है।
कोर्ट में प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने स्पष्ट किया है कि अधिकांश संचालकों के पास सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) तक नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि विभाग अब तक खामोश क्यों बैठा है? किसके आदेश का इंतजार किया जा रहा है? क्या अदालत के बोलने के बाद ही इन लॉन्स पर कार्रवाई करने का इंतजार किया जा रहा है? यह भी माना गया है कि अधिकांश लोगों के पास ‘सहमति’ यानी मंजूरियां नहीं हैं।
ऐसे में फिर सवाल यही उठता है कि ये सब किसकी मेहरबानी से चल रहे हैं? किन अधिकारियों की ‘शह’ इन्हें मिल रही है? मनपा के अधिकारियों पर भी ‘गाज’ गिराने का वक्त आ गया है क्योंकि बिना आदेश उन्हें कुछ दिखाई देता नहीं है, जिसके कारण आसपास रहने वाले सैकड़ों परिवारों को मानसिक और शारीरिक परेशानियों में झोंक दिया जाता है।
कोर्ट ने जिस प्रकार से नाराजगी जाहिर की है, उससे स्पष्ट है कि पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर लापरवाही हुई है। अधिकारी अगर इसे गंभीरता से लेते, तो स्थिति इतनी खराब नहीं होती लेकिन अधिकारियों ने खुद के स्वार्थ के लिए सिविल लाइंस का ‘गला घोंट’ दिया है। उनकी उदासीनता के कारण लॉन्स तो पनपे ही, अब अतिक्रमणकारियों के हौसले भी बुलंद हो गए हैं। जगह-जगह अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है और वे सरकारी परिसरों को निशाना बनाने लगे हैं।
सिविल लाइंस में कुछ लॉन्स ऐसे हैं, जो चैरिटी की जमीन पर चल रहे हैं। जहां पर खेल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए था, परंतु ऐसा कुछ हो नहीं रहा है। खेल के साथ ‘खेल’ कर वे ‘धंधे’ पर उतारू हो गए हैं। यह भी नियमों के विपरीत है।
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युवाओं के खेल के नाम पर मिली जमीन पर लॉन कैसे चल रहे हैं? नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह भी एक रहस्य से कम नहीं है। हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जनता इन सभी मुद्दों पर ध्यान आकर्षित कराना चाहती है ताकि जनता को न्याय मिल सके और सिविल लाइंस की गरिमा बनी रह सके।
हाई कोर्ट ने जांच का आदेश दिया है। अगर मनपा और एमपीसीबी इस जांच के दौरान आसपास के लोगों की पीड़ा सुनें, तो उन्हें जमीनी वास्तविकता का पता चल पाएगा। वे समझ पाएंगे कि लोग किस स्थिति से गुजर रहे हैं। केवल खानापूर्ति करनी होगी, तो मनपा और एमपीसीबी वाले अधिकारी औपचारिकता पूर्ण कर फिर वही कहानी सुनाएंगे, जो जनता को पसंद नहीं आएगी।
सिविल लाइंस क्षेत्र में 13 प्रमुख लॉन, हॉल और क्लब हैं। इनमें स्वागत लॉन और हॉल, ग्रेट ग्रैंड लॉन, सीजन लॉन, सरपंच भवन, गोंडवाना क्लब, सीपी क्लब, सृष्टि लॉन, ऑफिसर क्लब, लेडीज क्लब, प्रेस्टीज हॉल और लॉन, जवाहर विद्यार्थी सभागृह, सतपुड़ा लॉन, देशपांडे सभागृह के नाम शामिल हैं।