मिहान परियोजना: नागपुर जमीन अधिग्रहण विवाद में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 3 महिलाओं की याचिका खारिज
Nagpur MIHAN Project News: नागपुर हाई कोर्ट ने मिहान परियोजना में अधिग्रहित जमीन के बदले विकसित भूखंड की मांग करने वाली 3 महिलाओं की याचिका खारिज कर दी।
- Written By: अंकिता पटेल
नागपुर, मिहान परियोजना,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur High Court MIHAN Project: नागपुर हाई कोर्ट ने मिहान परियोजना के तहत भूमि अधिग्रहण के बाद पुनर्वास नीति के अंतर्गत 150 वर्गमीटर के पूर्ण विकसित भूखंड की मांग करने वाली 3 महिलाओं की याचिका को खारिज कर दिया, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ‘परियोजना प्रभावित व्यक्ति’ (PAP) की कानूनी परिभाषा के अंतर्गत नहीं आते हैं।
जयश्री खड़तकर, शालिनी पाटिल और अंजीराबाई गावंडे ने रिट याचिका दायर की। याचिका में बताया था कि उन्होंने शिवणगांव स्थित ‘आम्बेडकरनगर को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड’ से अपनी गाढ़ी कमाई से भूखंड खरीदे थे। उन्होंने 1995 और 2001 में पंजीकृत विक्री विलेख के माध्यम से क्रमशः प्लॉट नंबर 48, 93 और 6 खरीदे थे। वर्ष 2005-2006 में मिहान कार्गो हब परियोजना के लिए इस जमीन (सर्वे नंबर 42/2) का अधिग्रहण किया गया था।
मुआवजा मिला लेकिन भूखंड की थी मांग अधिग्रहण के बाद कलेक्टर द्वारा मामला भेजे जाने पर जिला न्यायालय के आदेशानुसार इन भूखंड धारकों को नाममात्र दर के आधार पर प्रति वर्गफुट से मुआवजे की राशि का भुगतान कर दिया गया था लेकिन उनका दावा था कि 11 दिसंबर 2007 को जारी राज्य सरकार के सरकारी प्रस्ताव (जीआर) के अनुसार वे मिहान परियोजना प्रभावित व्यक्ति के रूप में पुनर्वास के तहत 150 वर्गमीटर के पूर्ण विकसित भूखंड के भी हकदार है।
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याचिकाकतों ने यह भी तर्क दिया कि महिलाओं के भूमि अधिकारों से संबंधित राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति’ के तहत भी उनी यह लाभ मिलना चाहिए क्योंकि अन्य 560 से अधिक पृष्टों की सूची वाले लाभार्थियों की यह भूखंड मिले हैं।
सरकार और एमएडीसी का कड़ा विरोध
महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट कंपनी (MADC) और राज्य सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया, उनका तर्क था कि 2007 का जीआर मुख्य रूप से उन लोगों पर लागू होता है जिनके मकान या गावठाण की जमीन अधिग्रहित की गई है और वे विस्थापित हुए है।
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महाराष्ट्र प्रकल्प प्रभावित व्यक्ति पुनर्वास अधिनियम, 1999 की धारा 2(2) के अनुसार, प्रभावित व्यक्ति यही है जो उस क्षेत्र का अधिभोगी हो या भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी होने से पहले कम से कम 5 साल तक वहां निरंतर निवास कर रहा हो या कोई व्यापार कर रहा हो।
सम्पत्ति के अधिकारी साबित करने में विफल
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रही हैं कि वे उस संपत्ति पर कब्जाधारी थीं या वहां अधिग्रहण से पूर्व लगातार 5 वर्षों तक निवास कर रही शी, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि भूमि के 7/12 उतारे (राजस्व रिकॉर्ड) में भी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू होने के समय तक केवल हाउसिंग सोसाइटी का नाम ही दर्ज था। इन सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने पाया कि याचिकाकतों पुनर्वास के इस लाभ के हकदार नहीं है और उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया।
