मुस्कान ही आधी दवा है! सर्वे में खुलासा- मरीजों की रिकवरी में वरदान साबित होता है डॉक्टरों का अच्छा बर्ताव
Doctor Patient Relationship: एक सर्वे में 88.1% लोगों ने माना कि डॉक्टरों का अच्छा व्यवहार मरीजों की रिकवरी में मदद करता है, जबकि 33.7% लोगों का मानना है कि डॉक्टर मानसिक दबाव में काम कर रहे हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस 2026, प्रतीकात्मक तस्वीर,(सोर्स: AI)
Doctors Behaviour Patient Recovery: हमारे समाज में डॉक्टरी पेशे को सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता है। मानवता की सेवा में उनका योगदान अतुलनीय है। कोरोना महामारी के दौरान सभी ने डॉक्टरों के साहस और समर्पण को देखा और महसूस किया। उसके अलावा मी जब-जब देश में ऐसी स्थितियां बनीं कि उनकी जरूरत पड़ी तो वे पीछे नहीं हटे।
हर स्थिति में दबाव के बावजूद उनका बस इतना कह देना कि सब ठीक हो जाएगा मरीज की रिकवरी में दवा बन जाता है। मरीज व डॉक्टर के बीच संवाद व समझ के सामंजस्य को लेकर हुए एक सर्वे में सामने आया है कि देश के 88.1 फीसदी लोगों का मानना है कि डॉक्टर्स का अच्छा व्यवहार उनकी बीमारी से रिकवरी करने में मदद करता है। 33.7 फीसदी लोगों ने यह भी माना कि डॉक्टर मानसिक दबाव में काम कर रहे हैं।
बर्नआउट के भी शिकार
वहीं यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट और मेडिकल डायलॉग्स की ओर से सार्थ में किए गए एक संयुक्त सर्वे के अनुसार 86 फीसदी युवा डॉक्टर्स और मेडिकल छात्रों का मानना है कि अत्यधिक ड्यूटी घंटे उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
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वहीं 62 फीसदी इंटर्स और पीजी छात्रों को साप्ताहिक अवकाश तक नहीं मिलता। पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च के शोध के अनुसार, लगभग 30 फीसदी डॉक्टर्स में डिप्रेशन के स्पष्ट लक्षण मौजूद है। साथ ही, लगभग 15 फीसदी डॉक्टर्स में क्रॉनिक एंजायटी की पुष्टि हुई।
चिकित्सक दिवस,प्रतीकात्मक तस्वीर,(सोर्स: AI)
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ज्यादा ड्यूटी से मेंटल हेल्थ को नुकसान क्या हैं कारण?
- 33.7% मानते हैं डॉक्टर कर रहे मानसिक दबाव में काम
- 44% लोग मानते हैं कि लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के डॉक्टर की होगी भविष्य में जरूरत
- 32.7% लोगों के अनुसार डॉक्टर उनकी बात सुनते हैं 10 मिनट से ज्यादा
- 15.5% लोगों ने लक्षणों से बीमारी की पहचान के लिए ली है एआइ की मदद
- 66.3% लोग मानते हैं लंबा कार्य समय, संसाधनों की कमी और मरीजों की अपेक्षाएं बड़ी चुनौती है।
- अत्यधिक कार्यभार: भारत में रेजिडेंट डॉक्टरों को अवसर 72 से 88 घंटे प्रति सप्ताह तक कार्य करना पड़ता है, जिसमें उन्हें न ठीक से खाना मिलता है, न आराम।
- संसाधनों की कमीः सरकारी और कई निजी मेडिकल संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और सुविधाएं नगण्य है।
