

National Doctors Day 2026 Theme: सफेद कोट पहने, गले में स्टेथॉस्कोप लटकाए और चेहरे पर एक शांत मुस्कान लिए डॉक्टर हमारे लिए उम्मीद का सबसे बड़ा चेहरा होते हैं। लेकिन वर्ष 2026 में, राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस की थीम हमें एक बेहद संवेदनशील और जरूरी पहलू पर सोचने को मजबूर करती है-"मास्क के पोछेः चिकित्सकों का उपचार कौन करता है?" यह थीम उस कड़वे सच को सामने लाती है जिसे हमारा समाज अक्सर अनदेखा कर देता है।
हर दिन मानसिक तनाव डॉक्टर भी हाड़-मांस के इंसान हैं। उनके पास बीमारियों का इलाज तो है, लेकिन उस मानसिक और शारीरिक तनाव का कोई रेडीमेड नुस्खा नहीं है जिससे वे हर दिन गुजरते हैं। समाज ने डॉक्टरों को 'भगवान' का दर्जा दे दिया है। इस भारी-भरकम दर्जे के कारण उन पर हमेशा परफेक्ट और मजबूत दिखने का एक अदृश्य मुखौटा चढ़ जाता है। वे न तो अपनी कमजोरी जाहिर कर पाते हैं और न ही आम इंसानों की तरह खुलकर अपना दर्द बयां कर पाते हैं।
जो डॉक्टर दूसरों को 'वर्क-लाइफ बैलेंस' या तनाव मुक्त रहने की सलाह देते हैं, वे खुद इस चक्रव्यूह में फंसे हैं। 'लोग क्या कहेंगे' और 'एक डॉक्टर होकर मैं कैसे कमजोर पड़ सकता हूँ' का डर उन्हें अंदर ही अंदर खोखला करता रहता है। डिप्रेशन और बर्नआउट के बावजूद वे मुस्कुराते हुए मरीजों का इलाज करते रहते हैं।
समय है मुखौटा हटाने का अब समय आ गया है कि हम इस मास्क को हटाएं, डॉक्टरों को भी एक मरीज बनने, आराम करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए थेरेपी लेने की उतनी ही आजादी होनी चाहिए, जितनी किसी आम इंसान को होती है।
संस्थागत बदलाव: चिकित्सा संस्थानों को ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार करना होगा जहां डॉक्टर बिना किसी झिझक के अपनी मानसिक समस्याओं पर बात कर सकें। ड्यूटी आवर्स का प्रबंधन डॉक्टरों की शिफ्ट के घंटे तय होने चाहिए ताकि उन्हें पर्याप्त आराम मिल सके।
काउंसलिंग सेलः हर बड़े अस्पताल में डॉक्टरों के लिए अनिवार्य और गोपनीय काउंसलिंग सेल होने चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य की चिंता भी इस चिकित्सक दिवस पर, आइए हम डॉक्टरों को भगवान के ऊंचे और अमानवीय आसन से उतारकर एक संवेदनशील इंसान के रूप में देखना शुरू करें। उनके समर्पण का सम्मान करने के साथ-साथ, हमें उनके स्वास्थ्य, 'विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य' की चिंता भी करनी होगी।
दूसरों की जान बचाते बचाते, डॉक्टर अक्सर खुद को खोने लगते हैं। उनके दैनिक जीवन की कुछ मुख्य चुनौतियां इस प्रकार है।
अत्यधिक कार्यभार लगातार 24 से 36 घंटों की लंबी शिफ्ट और नींद की भारी कमी।
भावनात्मक बोझ हर दिन गंभीर रूप से बीमार मरीजों और मृत्यु का सामना करना, जो उनके अवचेतन मन पर गहरा असर छोड़ता है।
हिंसा का डर अस्पतालों में बुनियादी ढांचे की कमी के कारण अक्सर डॉक्टरों को तीमारदारों के गुस्से और शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। निजी जीवन का अभावः काम के अनिश्चित घंटों के कारण वे अपने परिवार और स्वयं के लिए समय नहीं निकाल पाते।
चिकित्सकों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे चौकाने वाले और चिंताजनक है।
बर्नआउट की समस्याः विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 45% से 60% डॉक्टर गंभीर बर्नआउट' (अत्यधिक शारीरिक और मानसिक थकान) का सामना कर रहे है।
अवसाद: आम आबादी की तुलना में डॉक्टरों में एंग्जायटी और डिप्रेशन की दर करीब दोगुनी पाई गई है।
मदद की कमीः एक शोध के मुताबिक, मानसिक तनाव से जूझ रहे 70% से अधिक डॉक्टर पेशेवर मदद (थेरेपी) लेने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि इससे उनके करियर या सामाजिक प्रतिष्ठा पर असर पड़ेगा।