मध्य रेलवे में जनसंपर्क के नाम पर ‘प्रशासनिक मजाक’, GM के आदेश के बाद भी मंडलों को नहीं मिले स्वतंत्र PRO
Railway News: मध्य रेल में जनसंपर्क अधिकारी (PRO) की नियुक्ति को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक कलाबाजी सामने आई है। जीएम के निर्देशों के बावजूद मंडलों में स्वतंत्र PRO नहीं दिए गए।
- Written By: आकाश मसने
नागपुर रेलवे स्टेशन (सोर्स: सोशल मीडिया)
Central Railway PRO Appointment Issue: मध्य रेलवे में जनसंपर्क अधिकारी (PRO) के मुद्दे पर एक बार फिर ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली कहावत पूरी तरह सटीक बैठती नजर आई है। मुंबई जोन के अंतर्गत नागपुर, पुणे, भुसावल और सोलापुर मंडलों में जनसंपर्क व्यवस्था सुधारने के नाम पर नया आदेश जारी किया गया। यह आदेश व्यवस्था को मजबूत करने की बजाय प्रशासनिक कलाबाजी का उदाहरण बन गया है। आदेश (जी।402/पीआर/स्टाफ) में लिखा गया है कि नामित कमर्शियल अधिकारी अपने वर्तमान दायित्वों के अतिरिक्त जनसंपर्क का काम देखेंगे जो पहले भी हो रहा था।
महाप्रबंधक विवेक कुमार गुप्ता की नाराजगी के बाद 2 जनवरी 2026 को यह आदेश जारी किया गया। इस कागजी सक्रियता से पता चलता है कि व्यवहार में ‘इसकी टोपी उसके सिर’ की पुनरावृत्ति कर दी गई, पीआरओ फिर भी नहीं देंगे।
DCM से लेकर ACM को चार्ज
मध्य रेल नागपुर मंडल में जनसंपर्क विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी सहायक वाणिज्य प्रबंधक (एसीएम) संजय मुले को सौंपी गई है। इससे पहले यह कार्यभार वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक (Senior Divisional Commercial Manager) के पास था। इसी तरह पुणे में डीसीएम हेमंत कुमार बेहरा, भुसावल में डीसीएम बीबी तपस्वी और सोलापुर में एसीएम सुदर्शन देशपांडे को जनसंपर्क की जिम्मेदारी दी गई है।
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हालांकि जीएम गुप्ता हर मंडल में जनसंपर्क अधिकारी चाहते थे। इसके बावजूद किसी भी मंडल को स्वतंत्र पीआरओ नहीं दिया गया। उलटे, सीनियर अधिकारियों से जनसंपर्क का दायित्व छीनकर जूनियर स्तर के अधिकारियों को अतिरिक्त चार्ज थमा दिया गया।
जब GM का चेहरा हुआ था सुर्ख
महाप्रबंधक गुप्ता 24 दिसंबर 2025 को नागपुर मंडल के वार्षिक निरीक्षण दौरे पर थे। निरीक्षण के दिन की सुबह ही उन्हें समझ आया कि जनसंपर्क विभाग समाचार पत्रों में प्रकाशित वास्तविकताओं को उनसे छुपाता रहा है। इसके अन्य कार्यों में भी विभाग की कार्यप्रणाली से वे खासे नाराज दिखे। देर शाम मीडिया से संवाद की कमी और सकारात्मक छवि निर्माण में ढिलाई को लेकर उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि हर मंडल में तत्काल जनसंपर्क अधिकारी की व्यवस्था की जाए लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
हालांकि यह पहला मौका नहीं है। गत वर्ष फरवरी 2025 में तत्कालीन GM धर्मवीर मीणा के वार्षिक दौरे में भी मंडलों में पीआरओ पद को लेकर तीखे सवाल उठे थे लेकिन जवाब टालमटोल भरा ही रहा। नतीजतन, जोन हेडक्वार्टर एक वर्ष में 4 पीआरओ (काबिल रेल अधिकारी) नहीं ढूंढ सका। इस बार जीएम गुप्ता की सख्ती के बावजूद वही पुराना फॉर्मूला दोहरा दिया गया।
क्या PCCM को अधिकार है?
रेलवे में जनसंपर्क विभाग वाणिज्य (कमर्शियल) के नहीं बल्कि सामान्य प्रशासन (जनरल एडमिन) विभाग के अधीन आता है। ऐसे में मंडलों में जनसंपर्क से जुड़ा कोई भी अधिकारी या कर्मचारी सीनियर डीसीएम/डीसीएम को नहीं बल्कि सीधे अपर मंडल रेल प्रबंधक (एडीआरएम) को रिपोर्ट करता है। इससे पहले मुंबई मंडल में ही एक वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी ने कमर्शियल को रिपोर्ट करने से इनकार भी किया था और नियमसंगत होने के कारण उनके खिलाफ कोई कुछ नहीं कर सका।
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ऐसे में सवाल उठता है कि उक्त आदेश को कमर्शियल विभाग के सर्वोच्च अधिकारी पीसीसीएम ने आखिर किस नियम और अधिकारी के तहत मंजूरी दी? अपने ही विभाग के अधिकारियों को जनसंपर्क की जिम्मेदारी सौंपना यही दर्शाता है कि ‘समस्या मानी भी जा रही है और टाली भी जा रही है।’
5G के दौर में 20 दिन बाद पहुंचा आदेश
उल्लेखनीय है कि उक्त आदेश 2 जनवरी 2026 को जारी किया गया था लेकिन नागपुर मंडल पहुंचने में इसे 20 दिन लग गये। ईमेल और 5जी के दौर में मध्य रेल की इस कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठना लाजमी है। हर दिन जहां अधिकारियों के अधिकांश कामकाज वाट्सएप पर आदेशों और जानकारियों के लेन-देन के साथ कुछ सेकंडों में हो जाते हैं वहीं इस आदेश को मुंबई से नागपुर पहुंचने में 20 दिन लगना जोन हेडक्वार्टर की कार्यप्रणाली ही नहीं बल्कि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की कप्तानी पर सवाल खड़े करने के लिए काफी है।
