अपने ही पत्र से फंसी सुनेत्रा, अध्यक्ष पद के साथ पार्थ की रास उम्मीदवारी भी खतरे में…
Sunetra Pawar: सुनेत्रा पवार द्वारा चुनाव आयोग को लिखे गए एक पत्र ने राकां में नया राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है, जिससे उनके अध्यक्ष पद और पार्थ पवार की राज्यसभा उम्मीदवारी दोनों पर खतरा मंडराया है।
- Written By: आंचल लोखंडे
Sunetra Pawar Controversy (सोर्सः सोशल मीडिया)
Ajit Pawar NCP Faction Crisis: पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के निधन के बाद राकां (अजीत पवार) पार्टी में में छिड़ा आंतरिक संघर्ष अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी पर वर्चस्व को लेकर जारी खींचतान के बीच, वर्तमान अध्यक्ष सुनेत्रा पवार द्वारा चुनाव आयोग को लिखे गए एक पत्र ने खुद उनके और उनके बेटे पार्थ पवार के राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि इस एक पत्र के कारण सुनेत्रा पवार का अध्यक्ष पद और पार्थ पवार की राज्यसभा उम्मीदवारी दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।
विरोधियों को रोकने का दांव पड़ा उल्टा
अजीत पवार के निधन के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर दरार स्पष्ट दिखाई दे रही है। आरोप लग रहे हैं कि कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे पार्टी पूरी तरह कब्जा जमाने का प्रयास कर रहे हैं। संभवतः इसी गुटबाजी को भांपते हुए, सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि 28 जनवरी के बाद किए गए किसी भी पत्राचार को स्वीकार न किया जाए। सुनेत्रा का उद्देश्य पटेल और तटकरे के निर्णयों को रोकना था, लेकिन कानूनी पेच में अब उनका अपना ही पक्ष कमजोर होता दिख रहा है।
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अध्यक्ष पद पर लटकी तलवार
सूत्रों के अनुसार, यदि चुनाव आयोग सुनेत्रा पवार के आग्रह को मानकर 28 जनवरी के बाद का सारा पत्राचार रद्द करता है तो सबसे पहले उनकी अपनी नियुक्ति ही अवैध हो जाएगी। दरअसल, प्रफुल्ल पटेल ने सुनेत्रा पवार को राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त करने के संबंध में कार्यकारिणी की बैठक की सूचना और संबंधित दस्तावेज 28 जनवरी के बाद ही चुनाव आयोग को भेजे थे। यदि वह पत्राचार ही अमान्य हो जाता है, तो तकनीकी रूप से सुनेत्रा का चयन ही प्रक्रिया से बाहर हो जाएगा, जिससे उनका अध्यक्ष पद जाना लगभग तय माना जा रहा है।
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पार्थ पवार की उम्मीदवारी पर संकट
इस विवाद का सबसे घातक असर पार्थ पवार के राजनीतिक करियर पर पड़ता दिख रहा है। पार्थ पवार ने राज्यसभा चुनाव के लिए जो ‘एबी फॉर्म’ जमा किया है, उस पर प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे के हस्ताक्षर हैं। चूंकि यह पूरी प्रक्रिया और नामांकन 28 जनवरी के बाद संपन्न हुआ है, इसलिए पत्र की शर्तों के अनुसार इसे भी रद्द किया जा सकता है। इस तकनीकी पेंच ने पार्टी के भीतर एक बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया है, जिससे समर्थकों के बीच भारी बेचैनी देखी जा रही है। अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं।
(इनपुट: जितेंद्र मल्लाह)
