विधानसभा में मुनगंटीवार का बयान: राज्यपाल को मराठी सीखनी चाहिए, अंग्रेजी अनुवाद पर अटका विधेयक

Maharashtra Assembly में सरकारी कर्मचारियों द्वारा माता-पिता की देखभाल से जुड़े निजी विधेयक को लेकर तीखी बहस हुई। अंग्रेजी अनुवाद न होने के कारण विधेयक अटक गया,सुधीर मुनगंटीवार ने कड़ी आपत्ति जतायी।
Sudhir Mungantiwar
Sudhir Mungantiwar (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Sudhir Mungantiwar Assembly Statement: सरकारी कर्मचारियों के माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी तय करने वाला महत्वपूर्ण विधेयक केवल अंग्रेजी अनुवाद न होने के कारण अटका रहा, जिससे गुरुवार को विधानसभा में जोरदार बहस हुई।

भाजपा विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने आक्रामक रूप से कहा कि राज्यपाल को मराठी सीखनी चाहिए, मैं अंग्रेजी में विधेयक नहीं दूंगा। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने संविधान के अनुच्छेद 348(3) का हवाला देते हुए मुनगंटीवार का विरोध खारिज कर दिया।

मुनगंटीवार का तर्क

मुनगंटीवार ने सरकारी कर्मचारियों के माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी तय करने वाला निजी विधेयक पेश किया था। यह विधेयक दिसंबर में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन चर्चा के लिए बुलेटिन में नहीं आया, जिससे मुनगंटीवार ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि मुझे बताया गया कि विधेयक की अंग्रेजी प्रति राज्यपाल को नहीं दी गई, इसलिए यह बुलेटिन में नहीं आ सकता।

लेकिन अंग्रेजी प्रति तैयार करना मेरी जिम्मेदारी नहीं है। यदि अधिकारी मराठी सीखते हैं, तो राज्यपाल को भी मराठी सीखनी चाहिए। मुनगंटीवार ने आगे कहा कि बुद्धिमानी और नियमों का उपयोग समाजहित के निर्णय लेने के लिए होना चाहिए, कामकाज रोकने के लिए नहीं।

उन्होंने बताया कि यदि कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करता है, तो उसके वेतन का 20% सीधे माता-पिता के खाते में जाएगा। केवल अंग्रेजी अनुवाद न होने के कारण हजारों माता-पिता को इस सुरक्षा से वंचित रखना उचित नहीं है।

राहुल नार्वेकर ने पढ़े नियम

  • सुधीर मुनगंटीवार की आक्रामक प्रतिक्रिया के बाद विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने उन्हें संवैधानिक नियम याद दिलाए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल अंग्रेजी या मराठी पढ़ सकते हैं या नहीं, इस पर विधानसभा में चर्चा करना अनुचित है।
  • विधेयक का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत करने की शर्त विधिमंडल या राज्यपाल की नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 348(3) के अंतर्गत निर्धारित है।
  • अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि सरकारी विधेयक के मामले में अनुवाद की जिम्मेदारी विधि और न्याय विभाग की होती है, लेकिन जब कोई सदस्य निजी विधेयक पेश करता है, तो अंग्रेजी अनुवाद की पूरी जिम्मेदारी उस संबंधित सदस्य की होती है।
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