परिवारवाद पर शिंदे गुट के नेताओं का प्रहार, कार्यकर्ताओं को मौका देकर बनाई मिसाल
Dynasty Politics: शिवसेना (शिंदे गुट) के नेताओं ने मुंबई और ठाणे महानगरपालिका चुनावों से पहले परिवारवाद को दरकिनार कर आम कार्यकर्ताओं को टिकट देकर नई राजनीतिक मिसाल पेश की है।
- Written By: आंचल लोखंडे
Dynasty Politics:शिवसेना (शिंदे गुट) (सोर्सः सोशल मीडिया)
BMC elections: मुंबई और ठाणे में आगामी महानगरपालिका चुनावों से पहले एक दिलचस्प और सकारात्मक राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। आमतौर पर चुनावों में जहां नेता अपने परिवार और रिश्तेदारों को टिकट दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं, वहीं शिवसेना (शिंदे गुट) के कुछ प्रमुख नेताओं ने ‘परिवारवाद’ को दरकिनार कर सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दी है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के पूर्व सांसद राहुल शेवाले की पत्नी कामिनी शेवाले, मंत्री प्रताप सरनाईक के पुत्र पूर्वेश सरनाईक और सांसद नरेश म्हस्के के पुत्र आशुतोष म्हस्के ने उम्मीदवारी से पीछे हटकर एक राजनीतिक मिसाल पेश की है।
टिकटों की होड़
मुंबई नगर निगम चुनाव में टिकटों की होड़ के बीच कामिनी शेवाले मानखुर्द स्थित प्रभाग क्रमांक 142 से चुनाव लड़ने की इच्छुक थीं और उन्होंने जनसंपर्क भी शुरू कर दिया था। लेकिन नामांकन से ठीक पहले उन्होंने स्थानीय 25 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता कुमारी अपेक्षा गोपाल खांडेकर के पक्ष में अपनी दावेदारी वापस ले ली।
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कामिनी शेवाले ने कहा, “कार्यकर्ता चाहते थे कि मैं चुनाव लड़ूं, लेकिन अपेक्षा खांडेकर वर्षों से यहां सामाजिक कार्य कर रही हैं। इसलिए मैंने और मेरे पति राहुल शेवाले ने पार्टी से अनुरोध किया कि टिकट उन्हें ही दिया जाए।” पार्टी ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए अपेक्षा खांडेकर को आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया।
‘राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा’
ठाणे की राजनीति में विधायक प्रताप सरनाईक के पुत्र और पूर्व नगरसेवक पूर्वेश सरनाईक ने भी सबको चौंका दिया। उन्होंने प्रभाग क्रमांक 14 से चुनाव न लड़ने का फैसला किया। सोशल मीडिया पर वायरल अपने पत्र में उन्होंने लिखा, “राजा का बेटा ही राजा नहीं बनेगा, बल्कि जो हकदार होगा वही राजा बनेगा।” उन्होंने अपनी सीट एक वफादार शिवसैनिक के लिए छोड़ने की घोषणा की।
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पार्टी हित में त्याग
ठाणे के प्रभाग क्रमांक 19 में सांसद नरेश म्हस्के के पुत्र आशुतोष म्हस्के का नाम भी टिकट की दौड़ में सबसे आगे था। हालांकि, पार्टी को अन्य वरिष्ठ नेताओं को समायोजित करना था। अंततः आशुतोष की जगह किसी अन्य पुराने कार्यकर्ता को टिकट दिया गया। इस पर नरेश म्हस्के ने कहा, “पार्टी में कुछ मजबूरियां होती हैं। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को कोई असुविधा न हो, इसलिए हमने पार्टी हित में यह त्याग किया है।”
