Supriya Sule Sunetra Pawar (फोटो क्रेडिट-X)
NCP Merger Talk Ends Jayant Patil: महाराष्ट्र की राजनीति में राज्यसभा चुनाव की धुंध छंटने के साथ ही सत्ता और विपक्ष के बीच एक मौन कूटनीतिक समझौता नजर आ रहा है। राज्य की सात सीटों के लिए अब निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ हो गया है, जिसमें महायुति को छह और महाविकास आघाड़ी (MVA) को एक सीट मिलेगी। विपक्ष की ओर से अंततः शरद पवार के नाम पर मुहर लगी है, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपना सातवां उम्मीदवार न उतारने का निर्णय लिया। शरद पवार के एक बार फिर राज्यसभा जाने के साथ ही वे अगले साल संसदीय जीवन के 60 गौरवशाली वर्ष भी पूरे करेंगे। हालांकि, इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के विलय की अटकलों पर पूरी तरह विराम लग गया है।
अजित पवार के निधन के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर थी कि भावनात्मक आधार पर दोनों गुट फिर से एक साथ आ सकते हैं। लेकिन शरद पवार गुट के वरिष्ठ नेता जयंत पाटील ने स्पष्ट कर दिया है कि अब विलय की कोई संभावना नहीं बची है। इस घोषणा के साथ ही यह भी साफ हो गया है कि सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (शरदचंद्र पवार) अपनी अलग-अलग राह पर चलेंगी। अब सुप्रिया सुले के सामने पिता की पार्टी को एकजुट रखने और भविष्य की दिशा तय करने की एक नई और कठिन चुनौती खड़ी हो गई है।
शरद पवार की उम्मीदवारी तय होने के बाद बीजेपी ने सातवां उम्मीदवार न उतारने का जो फैसला लिया, उसे राजनीतिक जानकार एक सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं। आमतौर पर बीजेपी अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर विपक्षी खेमे में सेंधमारी करती रही है, लेकिन इस बार पवार के सम्मान में ‘खिड़की’ खुली रखकर बीजेपी ने एक विशेष राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सुप्रिया सुले के प्रति भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर उठाया गया हो सकता है। पवार के निर्विरोध निर्वाचन से विधानसभा में किसी भी तरह की तोड़-फोड़ की स्थिति टल गई है, जिससे एमवीए ने फिलहाल राहत की सांस ली है।
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जयंत पाटील ने अपने बयान में साफ किया कि दोनों पार्टियों के विलय का विचार मूल रूप से अजित पवार का ही था। 28 जनवरी को एक विमान दुर्घटना में अजित पवार के असामयिक निधन के बाद वह कड़ी टूट गई है जो दोनों धड़ों को जोड़ने का काम कर रही थी। पाटील ने स्पष्ट कहा कि जिस नेता के साथ विलय की बातचीत चल रही थी, जब वही इस दुनिया में नहीं रहे, तो अब मर्जर का सवाल ही पैदा नहीं होता। वर्तमान में सुनेत्रा पवार और सुप्रिया सुले अलग-अलग गुटों की कमान संभाल रही हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि पवार परिवार की राजनीतिक विरासत अब दो भिन्न धाराओं में प्रवाहित होगी।
कांग्रेस ने शरद पवार की उम्मीदवारी को समर्थन देने से पहले अपनी कुछ शर्तें रखी थीं, विशेषकर पार्टी के भविष्य के स्टैंड को लेकर। शरद पवार गुट के पास केवल 10 विधायक होने के बावजूद कांग्रेस (16 विधायक) और शिवसेना यूबीटी (20 विधायक) का समर्थन मिलना सुप्रिया सुले की कूटनीति की परीक्षा थी। अब जबकि विलय की बातचीत खत्म हो चुकी है, सुप्रिया सुले को अपनी पार्टी को बिखरने से बचाना होगा। राजनीतिक विश्लेषक दयानंद नेने के अनुसार, बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव के जरिए अपना एजेंडा सेट कर दिया है। अब सुप्रिया सुले को यह साबित करना होगा कि वे बिना अजित पवार और बिना किसी विलय के अपने दम पर पार्टी को कैसे आगे ले जाती हैं।