क्या रिलायंस में काम करने वाले सब मराठी बोलते हैं? ड्राइवरों के समर्थन में संजय निरुपम ने सरकार और MNS को घेरा
Sanjay Nirupam on Marathi Language: संजय निरुपम ने रिक्शा चालकों की मराठी परीक्षा का विरोध किया। रिलायंस-बिरला का उदाहरण देकर सरकार और MNS से पूछे कड़े सवाल।
- Written By: अनिल सिंह
Sanjay Nirupam on Marathi: महाराष्ट्र में रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता और ‘मराठी परीक्षा’ के फैसले पर राजनीति गरमा गई है। शिवसेना नेता संजय निरुपम ने इस मुद्दे पर अपनी ही सरकार के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक और राज ठाकरे की पार्टी (MNS) पर तीखा हमला बोला है। निरुपम ने सवाल उठाया कि जब रिलायंस और बिरला जैसी बड़ी कंपनियों या जोमैटो-स्विगी के डिलीवरी पार्टनर्स पर मराठी बोलने का दबाव नहीं है, तो केवल गरीब रिक्शा चालकों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है?
संजय निरुपम ने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को पत्र लिखकर इस फैसले को ‘सरासर अन्याय’ बताया। उन्होंने तर्क दिया कि रिक्शा और टैक्सी चलाने वाले लोग आमतौर पर उच्च शिक्षित नहीं होते। ऐसे में उनसे मराठी लिखने, पढ़ने और बोलने की परीक्षा लेना और फेल होने पर उनका परमिट रद्द करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
“संविधान और समानता का अधिकार”
संजय निरुपम ने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि देश का कोई भी नागरिक कहीं भी जाकर अपनी आजीविका कमाने के लिए स्वतंत्र है। उन्होंने कहा, “हम सभी हिंदू हैं और भारत के नागरिक हैं। भाषा, जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव करना राज्य के संविधान के विरुद्ध है। महाराष्ट्र सरकार का काम मराठी का संरक्षण करना है, लेकिन इसे दमन का जरिया नहीं बनाना चाहिए।” उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय लोगों को मराठी सिखाने के लिए व्यवस्था करनी चाहिए।
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MNS और वोटों की राजनीति पर पलटवार
मनसे (MNS) नेता संदीप देशपांडे द्वारा उन्हें “टुककर मानुष” कहे जाने और वोट बैंक की राजनीति का आरोप लगाने पर निरुपम ने कड़ा पलटवार किया। उन्होंने पूछा, “क्या आप वोटों के लिए मराठी भाषा पर जोर दे रहे हैं? आपके कितने विधायक और सांसद चुनकर आते हैं, यह सब जानते हैं। हम यह सब वोटों के लिए नहीं, बल्कि उन 15 लाख चालकों के अधिकारों के लिए कर रहे हैं जिनकी रोजी-रोटी पर संकट मंडरा रहा है।”
कॉरपोरेट जगत पर उठाए सवाल
संजय निरुपम ने सरकार के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या रिलायंस, बिरला या अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले सभी अधिकारी और कर्मचारी मराठी बोलते हैं? उन्होंने कहा कि अगर नियम लागू करना है तो सभी क्षेत्रों के लिए समान रूप से होना चाहिए, न कि केवल समाज के निचले तबके के लिए।
