गलतफहमी में न रहें भागवत...RSS प्रमुख के बयान पर राज का पलटवार, बोले- उबाऊ प्रवचन सुनने नहीं आए थे लोग

Raj Thackeray vs Mohan Bhagwat: मोहन भागवत के बयान पर भड़के राज ठाकरे। 'एक्स' पर बताया लोगों के कार्यक्रम में आने का असली कारण और कहा कि मराठी अस्मिता पर समझौता नहीं।
MNS chief Raj Thackeray slams RSS chief Mohan Bhagwat's comment on linguistic movements, calling guests at the RSS event 'fearful of the Modi govt'.
राज ठाकरे और मोहन भागवत (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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RSS 100 Years Mumbai: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर सियासी घमासान तेज हो गया है। मुंबई में आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में भाषा और उससे जुड़े आंदोलनों को लेकर दिए गए बयान पर अब मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। यह प्रतिक्रिया उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए पोस्ट के जरिए दी है।

राज ठाकरे ने लिखा कि मोहन भागवत ने भाषा को लेकर आग्रह रखना और उसके लिए समय-समय पर आंदोलन करना एक “बीमारी” बताया है। उन्होंने तंज कसते हुए ये भी लिखा कि आपके इस कार्यक्रम में जो भी लोग अलग अलग क्षेत्रों से आए थे वो नरेंद्र मोदी सरकार के डर से आए थे न कि उनका उबाई प्रवचन सुनने, तो वे गलतफहमी से बाहर आएं कि लोग उनके लिए आए थे।

शौक से नहीं हुआ भाषा के आधार पर राज्य का गठन

वहीं उन्होंने लिखा कि भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किसी शौक में नहीं हुआ था, बल्कि यह जनभावनाओं और पहचान से जुड़ा मुद्दा था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देश के अधिकतर राज्यों में यह भावना मौजूद है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पंजाब, बंगाल और गुजरात में भी गहरी भाषाई और प्रांतीय अस्मिता है। उन्होंने पूछा कि अगर यह बीमारी है तो फिर यह बीमारी पूरे देश में फैली हुई है।

दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में लोगों का आकर स्थानीय संस्कृति और भाषा को नकारना ही टकराव की जड़ बनता है। उन्होंने लिखा कि जब स्थानीय भाषा का अपमान होता है, वोट बैंक की राजनीति होती है और बाहरी दबदबा बढ़ता है, तब स्वाभाविक रूप से स्थानीय लोगों में आक्रोश पैदा होता है।

क्या इसे भी बीमारी कहा जाएगा। उन्होंने गुजरात का उदाहरण देते हुए पूछा कि जब वहां उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को खदेड़ा गया था, तब संघ प्रमुख ने समरसता का पाठ क्यों नहीं पढ़ाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मराठी समाज सहनशील है, लेकिन कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण ऐसे बयान देने की हिम्मत होती है।

मराठी और गुजराती समाज में मतभेद पर की टिप्पणी

एमएनएस प्रमुख ने संघ पर अप्रत्यक्ष राजनीति करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने लिखा कि कुछ समय पहले भैयाजी जोशी के बयान के जरिए मुंबई की भाषा को लेकर मराठी और गुजराती समाज को आमने-सामने लाने की कोशिश हुई। उनका कहना था कि यह सब भाजपा को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए किया गया।

राज ठाकरे ने साफ कहा कि संघ के काम के प्रति सम्मान है, लेकिन अराजनीतिक होने का दावा करने वाला संगठन अगर राजनीतिक खेल खेलेगा तो सवाल उठेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर समरसता की बात करनी है तो पहले हिंदी थोपने वाली सरकार को रोका जाए, क्योंकि हिंदी राष्ट्रभाषा भी नहीं है।

हिंदुओं पर हमला होने पर एमएनएस हमेशा खड़ी रही

राज ठाकरे ने हिंदुत्व के मुद्दे पर भी मोहन भागवत से सवाल पूछे। उन्होंने लिखा कि हिंदुओं पर हमला होने पर एमएनएस हमेशा खड़ी रही है, चाहे वह रजा अकादमी के खिलाफ मोर्चा हो, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों का मुद्दा हो या हिंदू त्योहारों में आम लोगों को हो रही परेशानी।

उन्होंने उत्तर भारत की कांवड़ यात्राओं, बीफ एक्सपोर्ट और गौहत्या की राजनीति का जिक्र करते हुए पूछा कि इन मुद्दों पर संघ प्रमुख कब बोलेंगे। अंत में उन्होंने साफ कहा कि एमएनएस के लिए मराठी भाषा और मराठी आदमी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। भाषाई और प्रांतीय अस्मिताएं रहेंगी और महाराष्ट्र पूरी ताकत के साथ अपनी पहचान की रक्षा करेगा।

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