बीएमसी महापौर (सौ. डिजाइन फोटो )
Mumbai Mayor News Update: मुंबई महापौर पद के चुनाव में बीजेपी ने पुराने नियम को बदल कर बड़ा खेला कर दिया है। राज्य की सत्ता और मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में मिली सर्वाधिक सीटों के दम पर एक बड़ी चाल चलते हुए एक बीजेपी ने शिवसेना (यूबीटी) की पूरी रणनीति को फेल कर दिया है।
आगामी महापौर चुनाव प्रक्रिया में ‘पीठासीन अधिकारी’ (प्रेसीडिंग अधिकारी) की नियुक्ति का पुराना नियम बदलकर सरकार ने भगवान की मर्जी हुई, तो हमारा भी महापौर हो सकता है, कहने वाले पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका दिया है।
नई अधिसूचना के अनुसार, अब महापौर चुनाव के सभी अधिकार पालिका आयुक्त या सचिव दर्जे के अधिकारी को दिए गए हैं। 1997 से मुंबई महानगरपालिका में शिवसेना-भाजपा की सत्ता रही है, इसलिए पीठासीन अधिकारी को लेकर कभी विवाद नहीं हुआ।
पुरानी परंपरा के अनुसार, नई सभा की पहली बैठक में महापौर का चुनाव होने तक कामकाज देखने के लिए ‘पीठासीन अधिकारी’ नियुक्त किया जाता था। यह सम्मान या तो पूर्व महापौर को या सभा के सबसे वरिष्ठ पार्षद को मिलता था। पीठासीन अधिकारी अपना ही हो, इसके लिए ठाकरे गुट ने मोर्चाबंदी की थी, लेकिन अब राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं।
राज्य सरकार ने मुंबई महानगरपालिका की सत्ता की लड़ाई में एक बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए पहले ही पुराने नियम को बदल दिया, सरकार ने अधिसूचना जारी कर उसके ‘मंसूचों पर पानी फेर दिया’ है।
मुंबई महानगरपालिका का कार्यकाल तीन साल पहले ही समाप्त हो गया था। इसलिए पूर्व महापौर का विकल्प खत्म हो गया है। ऐसी स्थिति में पुराने नियम के अनुसार, उद्धव बाळासाहेब ठाकरे गुट की वरिष्ठ पार्षद श्रद्धा जाधव को पीठासीन अधिकारी के रूप में कामकाज देखने का अधिकार मिलता।
लेकिन यदि पीठासीन अधिकारी विपक्षी पार्टी का होता तो सत्ताधारियों को तकनीकी परेशानी हो सकती थी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि ठीक इसी ‘अवसर’ को हथियाने के लिए सरकार ने नियम में बदलाव किया है।
राज्य सरकार की नई नियमावली के अनुसार, अब महापौर चुनाव की तस्वीर साफ हो गई है। महापौर या उप-महापौर चुनाव की विशेष बैठक के पीठासीन अधिकारी के रूप में अब राज्य सरकार के सचिव दर्जे से कम नहीं होने वाले अधिकारी कामकाज देखेंगे।
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वर्तमान पालिका आयुक्त भूषण गगराणी प्रधान सचिव दर्जे के अधिकारी है, इसलिए यह तय है कि वे ही इस प्रक्रिया के पीठासीन अधिकारी होंगे। महापौर के अधिकार सीमित रहने वाले है। नवनिर्वाचित महापौर भी उप-महापौर चुनाव के समय पीठासीन अधिकारी के रूप में काम नहीं देख सकेंगे, सरकार के इस कदम से पहले दिन से ही सत्ताधारी और विपक्ष के बीच टकराव के संकेत मिल रहे है।