Bombay High Court (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Mumbai High Court Ruling On Special Audit: सहकारी संस्थाओं में विशेष लेखापरीक्षण (ऑडिट) को लेकर एक अहम निर्णय देते हुए मुंबई उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि विशेष ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश जांच प्रक्रिया की तैयारी का हिस्सा हैं। इन्हें अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता, इसलिए इनके खिलाफ तत्काल अपील या पुनरीक्षण याचिका दायर नहीं की जा सकती।
न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एकल पीठ ने कहा कि जांच के दौरान दिए गए निर्देश केवल प्रक्रिया का एक चरण हैं। यदि प्रारंभिक या अंतरिम आदेशों को ही चुनौती दी जाने लगे तो मूल जांच कभी पूरी नहीं हो पाएगी और कानून का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया जांच पूरी होने के बाद ही शुरू होती है।
अदालत ने बताया कि महाराष्ट्र सहकारी समितियां अधिनियम की धारा 81 के तहत लेखापरीक्षण आर्थिक अनियमितताओं की जांच का माध्यम है। यह केवल एक रिपोर्ट होती है, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाती है। वहीं धारा 88 के अंतर्गत संस्था को हुए नुकसान की जिम्मेदारी तय करने के लिए विस्तृत जांच की जाती है, जिसमें साक्ष्य एकत्रित किए जाते हैं और संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण मांगा जाता है।
अदालत ने कहा कि यदि जांच पूरी होने के बाद किसी व्यक्ति के खिलाफ जिम्मेदारी तय की जाती है, तभी धारा 154 के तहत पुनरीक्षण का अधिकार उपलब्ध होता है। प्रारंभिक या जांच की तैयारी से जुड़े आदेशों के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।
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यह फैसला सहकार मंत्री द्वारा 17 दिसंबर 2025 को जारी उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें तत्कालीन प्रशासक द्वारा शुरू किए गए विशेष ऑडिट और धारा 88 के तहत जारी जांच आदेशों को रद्द कर दिया गया था। अदालत ने अपने पूर्व 14 जनवरी 2024 के आदेश का भी उल्लेख करते हुए दोहराया कि जांच से जुड़े अंतरिम निर्देश अंतिम निर्णय नहीं माने जा सकते।
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