सावित्रीबाई की भूमि पर बेटियों पर संकट! महाराष्ट्र में गिरता लिंगानुपात, जानें राज्य की स्थिति चिंताजनक क्यों?
Girl Child Birth Rate: SRS रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में 1000 लड़कों पर महज 888 बेटियां; गांवों से भी बदतर हुई शहरों की स्थिति। जानें शिक्षा और आधुनिकता के बीच क्यों सिसक रही हैं बेटियां।
- Written By: गोरक्ष पोफली
सांकेतिक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Declining Child Sex Ratio In Maharashtra: जिस महाराष्ट्र ने जिजामाता जैसी ओजस्वी और सशक्त माता, सावित्रीवाई फुले जैसी महान समाज सुधारक और आनंदीबाई जोशी जैसी देश की पहली महिला डॉक्टर की विरासत को संजोया है, आज वही प्रदेश अपनी ही नन्हीं कलियों के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। यह अत्यंत विचलित करने वाली बात है कि जिस भूमि ने नारी शक्ति, सम्मान और शिक्षा की नींव रखी, वहां आज जन्म के समय लिंगानुपात गिरकर 1,000 लड़कों पर महज 888 बेटियां रह गया है। आधुनिकता और आर्थिक प्रगति की आड़ में छिपी यह कड़वी हकीकत महाराष्ट्र के उस गौरवशाली इतिहास पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है, जहाँ कभी बेटियों को कुल का दीपक माना जाता था।
आंकड़ों में छिपी एक अनकही पीड़ा
सरकारी रिपोर्ट (SRS) ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे सिर्फ संख्या नहीं बल्कि उन मासूमों की खामोश चीखें हैं जिन्हें दुनिया देखने का हक तक नहीं दिया गया। रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 से 2022 के बीच महाराष्ट्र में बेटियों के जन्म की रफ्तार देश के बाकी राज्यों के मुकाबले काफी धीमी रही। महाराष्ट्र में 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 बेटियाँ ही जन्म ले रही हैं, जबकि देश का औसत 918 है। साल 2020 से 2022 के बीच के आंकड़े और भी डरावने हैं, जहाँ महाराष्ट्र में जन्म दर महज 899 रही, जो राष्ट्रीय औसत 918 से काफी पीछे है। मई 2026 में जब ये आंकड़े विधानसभा में रखे गए, तो वहां हंगामा तो हुआ, लेकिन सवाल वही रहा क्या हम वाकई तरक्की कर रहे हैं?
शिक्षा और आधुनिकता का कैसा ये क्रूर मजाक?
इस रिपोर्ट का सबसे विचलित कर देने वाला पहलू यह है कि शहरों की स्थिति गांवों से भी बदतर है। हम सोचते थे कि शहरों में लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, वहां की सोच आधुनिक होगी, लेकिन हकीकत इसके उलट है। जहाँ महाराष्ट्र के गांवों में सुधार हुआ है और लिंगानुपात 888 से बढ़कर 1,000 लड़कों पर 910 लड़कियों के जन्म तक पहुंच गया है, वहीं शहरों में यह आंकड़ा 908 से गिरकर महज 885 पर आ गया है। यह देखकर रूह कांप जाती है कि जहाँ ज्यादा सुविधाएं और तकनीक होनी चाहिए थी, वहां उसका इस्तेमाल नन्हीं जानों को बचाने के बजाय उन्हें खत्म करने में किया जा रहा है।
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शहर बनाम गांव आकड़ो का विवरण (सोर्स: एआई)
दूसरों से सीखने की ज़रूरत
आज महाराष्ट्र को छत्तीसगढ़ (978) और केरल (974) जैसे राज्यों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। ये राज्य भले ही आर्थिक दौड़ में महाराष्ट्र से पीछे हों, लेकिन अपनी बेटियों को संजोने में वे कहीं आगे निकल गए हैं। दूसरी ओर, उत्तराखंड (872) की स्थिति सबसे चिंताजनक बनी हुई है, और हरियाणा (885) व दिल्ली (876) जैसे इलाके भी इसी निराशाजनक दौड़ का हिस्सा हैं।
साजिश का शिकार होती मासूमियत
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) की पूर्व प्रोफेसर डॉ. वंदना सोनलकर जैसे एक्सपर्ट्स इस कड़वे सच से पर्दा उठाते हुए कहती हैं कि यह सब डॉक्टरों की साठगांठ और समाज की बेटा ही चाहिए वाली जिद का नतीजा है। कानून की कड़ाई के बावजूद शहरों में गुपचुप तरीके से लिंग जांच का काला धंधा फल-फूल रहा है, जो प्रशासन की मुस्तैदी पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
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एक आखिरी सवाल…
क्या हमारी आर्थिक तरक्की का कोई मोल है, अगर हमारे घरों के आंगन में बेटियों की किलकारियां ही कम हो जाएं? यह सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम उस सोच को बदलें जो एक बेटे के लिए अपनी ही बेटियों का गला घोंट देती है।
