मुंबई में LPG की किल्लत से क्लाउड किचन बंद, टिफिन कारोबार पर संकट, मछुआरे भी परेशान
Dabbawala Network Impact: मुंबई में गैस सिलेंडर की कमी से टिफिन सेवाएं और क्लाउड किचन बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। कई कारोबार बंद होने की कगार पर हैं, वहीं मछुआरे भी बढ़ती डीजल कीमतों से संकट में हैं।
- Written By: अपूर्वा नायक
मुंबई के डब्बावाले (सौ. सोशल मीडिया )
Mumbai Gas Shortage Affect On Tiffin Service: मुंबई की मजबूत टिफिन सेवा घर जैसा खाना उपलब्ध कराने वाले एक विशाल और विकेंद्रीकृत नेटवर्क, जिसने ऑनलाइन डिलीवरी के आने से बहुत पहले ही शहर को भोजन उपलब्ध कराया वह भी अब गैस संकट से जूझ रही है।
शहर के विभिन्न इलाकों में रसोई संचालकों को अपने काम में बदलाव करना पड़ रहा है। डब्बावाले से जुड़ी कई महिलाओं की नौकरी चली गई है। गैस संकट से कुछ मामलों में कारोबार भी बंद करना पड़ रहा है।
जोगेश्वरी में लक्ष्मी टिफिन सर्विस को सप्ताह के बीच में ही बंद करना पड़ा, जब दूसरा सिलेंडर खत्म हो गया। 30 वर्षीय आकाश अधिवंद ने बताया, “रीफिल की कोशिश की, लेकिन नहीं मिला। वे रोज करीब 70 लोगों को 100 रुपये प्रति डब्बा खाना उपलब्ध कराते थे।
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गैस सिलेंडर की कमी के कारण शहर में 60 से 70 प्रतिशत क्लाउड किचन व कॉर्पोरेट किचन बंद हो गए हैं। प्रति दिन डिलीवरी कम होती जा रही है इससे आय भी कम होती जा रही है। हम कई किचन को कोयला या इलेक्ट्रक का उपयोग करने के लिए सुझाव दे रहे हैं।
-विष्णु कालडोके, प्रवक्ता, डब्बा वाला
कारोबार बंद होने की कगार पर
उनके ऑर्डर 500 डब्बों से घटकर करीब 300 रह गए है। सिगडी पर खाना बनाने में ज्यादा समय लगता है। उनका कैटरिंग व्यवसाय भी प्रभावित हुआ है, क्योंकि “लकड़ी या कोयले पर चीनी व्यंजन या डीप भांडुप में फाई स्नैक्स बनाना संभव नहीं है।
‘भोजन्यान टिफिन सर्विस’ चलाने वाले 29 वर्षीय ओंकार अजित पाटकर कारोबार बंद करने की कगार पर है। “पिछले दो हफ्तों से एक भी एलपीजी सिलेंडर नहीं मिला। तीन सिलेंडरों का सीमित उपयोग करने के बाद अब वे दो इलेवट्रिक स्टोव पर निर्भर है। गैस के मुकाबले दोगुना समय लगता है। उन्होंने स्विगी और जोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म पर ऑर्डर लेना बंद कर दिया है और मेन्यू भी सीमित कर दिया है। -25,000 रुपये किराया और सात कर्मचारियों के साथ यह व्यवस्था चलाना मुश्किल है।
मछुआरे भी मुश्किल में
- राज्य के मछुआरे इन दिनों बढ़ती डीजल कीमतों के कारण गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से तात्कालिक हस्तक्षेप की मांग की है। मत्स्य व्यवसाय एवं बंदरगाह मंत्री नीतेश राणे ने केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया है और राहत उपायों की अपील की है।
- राज्य में 136 मछुआरा सहकारी संस्थाओं के माध्यम से करीब 7,550 यांत्रिक नौकाएं संचालित होती है, जिनके लिए डीजल कोटा निर्धारित है। हालांकि, डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने मछुआरों का आर्थिक गणित बिगाड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के चलते ईंधन महंगा हो रहा है, जिसका सीधा असर मछली पकड़ने के व्यवसाय पर पड़ रहा है।
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खाड़ी देशों में युद्ध का असर: अब कोयले की सिगड़ी पर बना रहे खाना
गैस एजेंसियों से भी स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही है। वर्ली कोलीवाड़ा में नितिन मोरगांवकर (42) के ‘आईचा डब्बा’ टिफिन सर्विस में लागत तेजी से बढ़ी है। 14 किलो का सिलेंडर 920 रुपये से बढ़कर 2,500-3,000 रुपये हो गया है। पहले 120 रुपये में मिलने वाला खाना अब 135 रुपये का हो गया है और डिलीवरी सहित 175 रुपये पड़ता है। मुनाफा लगभग 30 प्रतिशत घट गया है। उनकी रोटी सप्लाई यूनिट, जहां पांच महिलाएं रोज 2,000 चपातियां बनाती थीं, अब बंद हो गई है। उन्होंने कहा, “मुझे दुख है कि उन महिलाओं का काम छिन गया। साकीनाका में 33 वर्षीय चिराग पुरोहित ने पुराने तरीकों की ओर रुख किया है। एलपीजी सिलेंडर नहीं मिलने के कारण, 2009 से ‘यम्मी टिफिन्स’ चला रहे पुरोहित अब लकड़ी और कोयले की सिगड़ी पर खाना बना रहे हैं। उन्होंने बताया, “रोटी-सब्जी के अलावा हम हाई-प्रोटीन राइस बाउल भी बनाते थे, लेकिन अब बंद करना पड़ा है।
