महाराष्ट्र सरकार का फैसला, जांच समिति की रिपोर्ट के बाद ही होगी एट्रोसिटी केस में गिरफ्तारी
Maharashtra Government ने एट्रोसिटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी प्रक्रिया में बदलाव किया है। अब एफआईआर दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी, बल्कि पहले समिति जांच करेगी।
- Written By: अपूर्वा नायक
एट्रोसिटी एक्ट (सौ. सोशल मीडिया )
Maharashtra Atrocity Act Arrest Rule: महाराष्ट्र सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी एट्रोसिटी कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है।
सामाजिक न्याय मंत्री एवं शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता संजय शिरसाट ने विधान परिषद में यह जानकारी देते हुए बताया कि अब इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज होते ही तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
पहले एक समिति मामले की जांच करेगी और अपराध सिद्ध होने पर ही गिरफ्तारी की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी के साथ भी अनावश्यक अन्याय न हो।
सम्बंधित ख़बरें
सिद्धिविनायक मंदिर में 18 करोड़ की सेंध! 9 गिरफ्तार और 46 सस्पेंड, ट्रस्ट ने खोला शिवसेना UBT कनेक्शन का राज
श्रीकांत शिंदे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली वैशाली दरेकर का इस्तीफा, उद्धव ठाकरे गुट को बड़ा झटका
बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी डॉक्टर नहीं कर सकेंगे प्राइवेट प्रैक्टिस, राज्य सरकार को राहत
5 से 10 साल का रुका किराया और 5000 करोड़ की जमीन का खेल; SRA CEO से मिले रोहित पवार और आदित्य ठाकरे
देश में दलितों और आदिवासियों को जाति-आधारित उत्पीड़न, भेदभाव और अपमान से सुरक्षा देने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 बनाया गया था।
इसे आमतौर पर ‘एट्रोसिटी एक्ट‘ कहा जाता है। इस कानून के तहत छुआछूत, गाली-गलौज, मारपीट, जमीन पर कब्जा, यौन उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार जैसे अपराध दर्ज किए जाते हैं। वर्ष 2015 में इस कानून में संशोधन कर इसे और सख्त बनाया गया था, जिसमें तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान जोड़ा गया था।
ये भी पढ़ें :- ईरान-इजराइल युद्ध के बीच गैस को लेकर राजनीति गरमायी, फडणवीस बोले- घरेलू LPG की कमी नहीं
कितने मामले और कितनी सजा ?
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में हर साल एट्रोसिटी कानून के तहत औसतन 50,000 से अधिक मामले दर्ज होते हैं, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र इनमें सबसे आगे हैं। महाराष्ट्र में प्रतिवर्ष लगभग 2,500 से 3,000 मामले दर्ज होते हैं। मुंबई में हर साल औसतन 150 से 200 मामले सामने आते हैं। देशभर में दर्ज मामलों में सजा की दर मात्र 25 से 30 प्रतिशत के आसपास है, जो इस कानून की कमजोरियों और दुरुपयोग दोनों की ओर इशारा करती है।
