Tiger Death: देश में बाघों की संख्या बढ़ी, लेकिन मौतों ने खड़े किए गंभीर सवाल
Maharashtra News: देश में बाघ संरक्षण की सफलता के बीच 2025 में 169 बाघों की मौत ने चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में जगह की कमी और क्षेत्रीय संघर्ष मौतों का बड़ा कारण बन रहे हैं।
- Written By: अपूर्वा नायक
टाइगर डेथ रिपोर्ट (सौ. सोशल मीडिया )
India Tiger Death Report: देश में बाघ संरक्षण को लेकर एक ओर जहां आबादी बढ़ाने को बड़ी सफलता मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर बाघों की बढ़ती मौतें गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं।
वर्ष 2025 के दौरान देशभर में विभिन्न कारणों से कुल 169 बाघों की मौत दर्ज की गई है, जो वर्ष 2024 की तुलना में 45 अधिक है। यह जानकारी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों में सामने आई है।
आंकड़ों के अनुसार, 55 बाघों की मौत के कारण मध्यप्रदेश पहले स्थान पर रहा है, जबकि महाराष्ट्र 41 बाघों की मौत के साथ दूसरे स्थान पर है। इसके बाद केरल में 13 और असम में 12 बाघों की मौत दर्ज की गई। इन 169 मृत बाघों में 31 शावक भी शामिल हैं, जो स्थिति की गंभीरता को और उजागर करते हैं।
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साल की पहली मौत ब्रह्मपुरी में
पिछले वर्ष महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में वर्ष 2025 की शुरुआत बाघों की मौत से हुई थी। जिसमें महाराष्ट्र में वर्ष 2025 की पहली बाघ मृत्यु 2 जनवरी को ब्रह्मपुरी वन मंडल में दर्ज की गई, जहां एक वयस्क नर बाघ मृत पाया गया।
इसके तीन दिन बाद मध्यप्रदेश के पेंच टाइगर रिजर्व में एक मादा बाघ की मौत हुई थी। महाराष्ट्र में हुई कुल बाघों की मौतों में से लगभग एक तिहाई मौतें व्याघ्र परियोजनाओं या संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हुई हैं। 2025 के अंतिम दिन वर्धा जिले में एक बाघ की मौत हुई।
वर्ष 2025 में मृत पाए गए कुल 41 बाधों में से 20 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, सात बाघ सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए, नौ मौतों के कारणों का पता नहीं चल सका, एक बाघ की मौत विषाक्तता से हुई, जबकि सात बाघों की मौत बिजली के करंट लगने से हुई।
जंगलों में जगह की कमी से बढ़ रहा संघर्ष
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाधों की मौत का सबसे बड़ा कारण क्षेत्रीय संघर्ष है, बाध स्वभाव से एकाकी और क्षेत्रीय जीव होते हैं, लेकिन जंगली में उपलब्ध स्थान सीमित होने के कारण वे आपस में टकरा रहे है।
बाधों पर लंबे समय से शोध कर रहे वन्यजीव विशेषज्ञ जयराम शुक्ला ने बताया कि देश में बाघों की आबादी अब सतृप्ति स्तर के करीब पहुंच रही है। बाधों के लिए निर्धारित क्षेत्र लगातार सीमित होते जा रहे है। इसी वजह से वे आपस में संघर्ष कर रहे है और कई मामलों में इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
बाघों की संख्या में लगभग 60 प्रतिशत की हुई वृद्धि
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यप्रदेश में वर्ष 2014 के बाद से बाधों की संख्या में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शुक्ला ने कहा कि यह वृद्धि अभूतपूर्व है, लेकिन सवाल यह है कि इतने बाधों के लिए क्षेत्र कहां है? यही वजह है कि संघर्ष और मौतें बढ़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस 2023 पर जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में बाघों की संख्या वर्ष 2018 में 2,967 थी, जी 2022 में बढ़कर 3,682 हो गई। यानी सालाना औसतन छह प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अधिकारियों के अनुसार, दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत बाघ आबादी भारत में पाई जाती है।
संरक्षण के लिए स्थानांतरण पर जोर
महाराष्ट्र में बाघों के संरक्षण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। बाधों के संरक्षण के लिए उनके स्थानांतरण (रीलोकेशन) पर जोर दिया जा रहा है। मृत पाए गए बाधों में प्राकृतिक कारणों से मरने वाले बाधों की संख्या अधिक है। शिकार, चिजली का करंट लगने और रेल दुर्घटनाओं में बाघों की मृत्यु की घटनाएं अपेक्षाकृत कम है।
– श्रीनिवास रेड्डी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव)
शिकार के मामलों में सख्त कार्रवाई
अधिकारियों के अनुसार, अब तक शिकार से जुड़े 10 मामलों में 21 लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है और कानूनी कार्रवाई जारी है। राज्य में हर चार वर्ष में होने वाली देशव्यापी बाघ गणना इस वर्ष शुरू हो चुकी है और संभावना जताई जा रही है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र दोनों में बाघों की सख्या में और वृद्धि हो सकती है।
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बेहतर प्रबंधन की जरूरत बढ़ी
विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की सफलता है, लेकिन इसके साथ नए वन क्षेत्र, कॉरिडोर और बेहतर प्रबंधन की जरूरत भी उतनी ही बढ़ गई है।
