हिंद साइकिल का राजा: मिल संस्कृति की विरासत को 21 दिनों तक जीवंत रखता वर्ली का ऐतिहासिक गणेशोत्सव

Hind Cycle Cha Raja Ganeshotsav: मुंबई के हिंद साइकिल के राजा का गणेशोत्सव 1952 से मिल संस्कृति और श्रमिक एकता की पहचान है। फैक्ट्री बंद होने के बाद भी 21 दिनों की परंपरा जारी है।
Hind Cycle Cha Raja Ganeshotsav In Mumbai
हिंद साइकिल का राजा(फोटो नवभारत)
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74 Year Old Ganeshotsav Tradition In Mumbai: वर्ली प्रभादेवी के हिंद साइकिल मार्ग पर स्थापित हिंद साइकिल का राजा मुंबई के पुराने, प्रसिद्ध और पारंपरिक सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलों में गिना जाता है। वर्ष 1952 में हिंद साइकिल लिमिटेड के कर्मचारियों और स्थानीय मिल कामगारों ने मिलकर इस मंडल की शुरुआत की थी।

आज भी यह उत्सव इलाके की मिल संस्कृति, श्रमिक एकता और कई पीढ़ियों की भावनात्मक स्मृतियों का प्रतीक बना हुआ है। आजादी के बाद के दौर में तत्कालीन बॉम्बे में मिलों और स्वदेशी उद्योगों का तेजी से विस्तार हो रहा था। उसी दौर में हिंद साइकिल लिमिटेड के श्रमिकों ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को आपसी एकजुटता और सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम बनाया।

हिंद साइकिल की शुरूआत

हिंद साइकिल की स्थापना 1939 में बिड़ला समूह ने की थी और इसके चेयरमैन उद्योगपति रामेश्वर दास बिड़ला थे। कंपनी भारत में बड़े पैमाने पर स्वदेशी साइकिल बनाने वाली शुरुआती फैक्ट्रियों में शामिल थी। वित्तीय संकट और मिल उद्योग की मंदी के बाद सरकार ने 1980 में कंपनी का अधिग्रहण किया।

इसके बाद इसका नाम नेशनल बाइसिकल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड रखा गया। लगातार घाटे और मिलों के बंद होने के बीच वर्ष 2001 में वर्ली स्थित फैक्ट्री का कामकाज पूरी तरह बंद हो गया। हालांकि फैक्ट्री बंद हो गई, लेकिन उससे जुड़ा गणेशोत्सव आज भी स्थानीय लोगों की स्मृतियों में जीवित है।

बप्पा राजा के ठाठ-बाठ में विराजमान

हिंद साइकिल के राजा की प्रतिमा अपने पारंपरिक और राजसी स्वरूप के लिए विशेष पहचान रखती है। बप्पा को सिंहासन पर राजा के ठाठ-बाठ में विराजमान किया जाता है। लालबाग और परेल जैसे प्रमुख मूर्तिकला केंद्रों के निकट होने के कारण इस प्रतिमा को शुरू से ही कुशल मूर्तिकारों ने आकार दिया है। भक्तों के अनुसार प्रतिमा का सजीव चेहरा और आकर्षक आंखें विशेष रूप से मन मोह लेती हैं।

मुंबई में गणेशोत्सव के दौरान नरे पार्क, लालबाग का राजा और परेल के प्रमुख गणपति मंडलों के दर्शन करने वाले श्रद्धालु अपनी यात्रा को हिंद साइकिल के राजा के दर्शन के साथ पूरा करते रहे हैं। यह परंपरा वर्ली के इस मंडल को शहर के पारंपरिक गणेशोत्सव मानचित्र में एक खास स्थान देती है।

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21 दिनों तक उत्सव मनाने की परंपरा है

जहां अधिकांश मंडलों में गणपति 10 या 11 दिनों तक विराजमान रहते हैं, वहीं हिंद साइकिल के राजा के यहां 21 दिनों तक उत्सव मनाने की ऐतिहासिक परंपरा रही है। मिलों के दौर में कर्मचारियों और दूर दराज से आने वाले लोगों की सुविधा को ध्यान में रखकर यह परंपरा शुरू हुई थी। आज भी वर्ली प्रभादेवी से दूसरे इलाकों में जा चुके परिवार इन 21 दिनों के दौरान दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।

मंडल की सजावट, पारंपरिक आरती, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम उत्सव का मुख्य आकर्षण होते हैं। पुराने समय में श्रद्धालुओं के लिए लकी ड्रॉ भी आयोजित किया जाता था, जिसमें मिक्सर, पंखा, कुकर, साइकिल और टीवी जैसे उपहार दिए जाते थे।

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हिंद साइकिल गणेशोत्सव मिल संस्कृति की विरासत

स्थानीय निवासियों के लिए यह गणपति बप्पा बचपन की यादों, पारिवारिक दर्शन और पड़ोस की साझा संस्कृति से गहराई से जुड़ा रहा है। मंडल के सलाहकार आदेश कुमार दुबे ने कहा कि हिंद साइकिल गणेशोत्सव मिल संस्कृति की साझी विरासत है। उन्होंने बताया कि मंडल में दिखावे से दूरी रखी जाती है।

यहां न डीजे बजाया जाता है, न गुलाल उड़ाया जाता है और न ही पटाखे फोड़े जाते हैं। मंडल में फिल्मी गीतों का भी उपयोग नहीं होता। दुबे के अनुसार आधुनिक दौर में अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को बचाए रखना मंडल का प्रमुख उद्देश्य है।