मराठी अस्मिता का सवाल या 'राज' की नई चाल? भाषा विवाद पर क्यों पलट गए फडणवीस, यहां जानिए पूरी कहानी

महाराष्ट्र में इस समय स्कूलों में हिंदी भाषा पढ़ाने को लेकर बवाल मचा हुआ है। सरकार ने अपना ही फैसला पलट दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि निकाय चुनाव पर क्‍या पड़ेगा असर?
मराठी अस्मिता का सवाल या 'राज' की नई चाल? भाषा विवाद पर क्यों पलट गए फडणवीस, यहां जानिए पूरी कहानी
राज ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस (डिजाइन फोटो)
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महाराष्ट्र में इस समय स्कूलों में हिंदी भाषा पढ़ाने को लेकर बवाल मचा हुआ है। राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने कक्षा 1 से 5 तक के स्कूलों में हिंदी को मराठी और अंग्रेजी के बाद तीसरी भाषा के तौर पर पढ़ाने का आदेश जारी किया है। इसके बाद विपक्षी पार्टियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

ये विवाद ऐसे समय में आया है जब महाराष्‍ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव की आहट है। विपक्षी पार्टियों के विरोध के बाद राज्य सरकार ने अपने पिछले आदेश को पलटते हुए एक नया आदेश निकाला। जिसमें कहा हिंदी के लिए अनिवार्य शब्द को हटा दिया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार ने इस समय अपना ही फैसला क्यों पलटा। साथ ही निकाय चुनाव पर क्‍या पड़ेगा असर?

महाराष्ट्र सरकार ने पलटा अपना ही फैसला

बता दें कुछ समय पहले सरकार ने हिंदी को तीसरी भाषा के तौर पर स्‍कूलों में अनिवार्य करने का फैसला सुनाया था, हालांकि, विपक्षी दलों और मराठी भाषा समर्थकों के विरोध के कारण सरकार ने तब ये फैसला वापस ले लिया था लेकिन अब कुछ संशोधन के साथ इसे जारी किया है।

मराठी वोटरों को अपने पाले में करने की कवायद

फडणवीस सरकार ने हिंदी विषय पढ़ाए जाने से अनिवार्यता शब्द हटा दिया है, बावजूद इस‍के विपक्षी दल स्‍कूलों में हिंदी को थोपे जाने का कदम बताया है। मराठी बनाम गैर मराठी के मुद्दें पर राजनीति शुरू हो गई है। इस मुद्दे के जरिए निकाय चुनाव में मराठी वोटरों को अपने पाले में लाने की कवायद तेज हो गई है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने इस आदेश का विरोध करके मराठी भाषी लोगों का दिल जीतना शुरू कर दिया है। मराठियों का झंडा उठाने वाली मनसे ने हिंदी किताबों के पहले और आखिरी पन्ने जला दिए और किताबें फाड़ भी दीं।

निकाय चुनाव में भाजपा पर क्या पड़ेगा असर?

भाजपा इस मुद्दे को लेकर काफी सतर्क है। पिछली बार जब भाजपा ने स्कूलों में तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी को अनिवार्य किया था, तो उसे डर था कि इसे महाराष्ट्र में मराठी भाषा के विरोध के तौर पर देखा जा सकता है, इसलिए भाजपा, शिवसेना और एनसीपी की महायुति सरकार ने विरोध के बाद फैसला वापस ले लिया था। लेकिन अब नए फैसले में अनिवार्य शब्द को हटाकर भाजपा ने मराठी लोगों की नाराजगी दूर करने और महाराष्ट्र में रहने वाले हिंदी भाषी लोगों का दिल जीतने की चाल चली है।

मराठी अस्मिता का सवाल या 'राज' की नई चाल? भाषा विवाद पर क्यों पलट गए फडणवीस, यहां जानिए पूरी कहानी
राज ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस (सोर्स: सोशल मीडिया)

हिंदी को लेकर लिए गए फैसले के पीछे क्या है राजनीति?

इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार चंद्रमोहन द्विवेदी का कहना है कि हिंदी भाषा को लेकर अनिवार्य शब्द हटाने के पीछे राज ठाकरे हो सकते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि राज ठाकरे ने लोकसभा में बिन शर्त भाजपा का समर्थन किया था। वहीं विधानसभा चुनाव के समय भी राज ने कहा था यदि सरकार को समर्थन देने की बात आई तो मनसे का समर्थन भाजपा को होगा।

महाराष्ट्र में निकाय चुनाव होने हैं। ऐसे भाजपा मुंबई, नासिक समेत ऐसे क्षेत्रों में मनसे का साथ रखना चाहेगी, जहां राज की पार्टी की अच्छी खासी पकड़ है। हिंदी को लेकर लिए गए फैसले से एक सप्ताह पहले राज ठाकरे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को मुलाकात हुई थी।

इस मुलाकात के बाद सियासी गलियारों में राज ठाकरे के महायुति में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई थी। दूसरी तरफ राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के एक होने की अटकलें भी महाराष्ट्र में जोरों पर है। दोनों पार्टियों के नेता आए दिन कोई न कोई ऐसा बयान जरूर देते हैं जिससे यह चर्चा और तेज हो जाती है।

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