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वो नेता जिसे जनता विरोध पर मुख्यमंत्री पद से देना पड़ा इस्तीफा, बालासाहेब भी नहीं दिला पाए जीत
Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: 14 अगस्त का दिन महाराष्ट्र के लिए खास है। यह वहीं दिन है जब दो बार महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी अंतिन सांसे ली थी।
- Written By: प्रिया जैस

विलासराव देशमुख (सौजन्य- सोशल मीडिया)
Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: आज यानी 14 अगस्त का दिन महाराष्ट्र के लिए बेहद ही खास है। आज महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की पुण्यतिथि है। महाराष्ट्र में कांग्रेस के कद्दावर नेता विलासराव देशमुख का आज ही के दिन 2012 में लिवर और किडनी की बीमारी के चलते चेन्नई के अस्पताल में निधन हो गया था।
विलासराव देशमुख का जीवन साधारण नहीं था। एक साधारण से लातूर जिले से निकलकर उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया। इस बीच उनके सामने कई मुश्किलें भी आई और अन्य राजनीतिक पार्टियों की ओर से दबाव भी रहा, लेकिन विलासराव देशमुख ने हार नहीं मानी और चुनाव में खड़े हुए। आज हम आपको यह बताएंगे की कैसा रहा विलासराव देशमुख का राजनीतिक सफर और आखिर क्यों उनको देना पड़ा अपने मंत्री पद से इस्तीफा।
राजनीतिक करियर की शुरुआत
आज के समय में विलासराव देशमुख महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा नाम है। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1974 में अपने पैतृक गांव से की। अपने गांव से वे पहले सदस्य चुने गए। बाद में 1974 से लेकर 1979 तक उन्होंने सरपंच की भूमिका निभाई और फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।
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सरपंच के बाद उन्होंने विधायक बनने का सोचा और 1980 में पहली बार महाराष्ट्र की विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ी। विधायक बनने से पहले विलासराव देशमुख ने लातूर तालुका पंचायत समिति का सभापति, उस्मानाबाद जिला परिषद सदस्य, उस्मानाबाद युवक कांग्रेस अध्यक्ष और उस्मानाबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी बड़ी पहचान बना चुके थे। इसके बाद वे 1985 से 1990 के बीच राज्यमंत्री के रूप में उभरे लेकिन जब 1995 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें हार का सामना करना पड़ा। दरअसल, इस दौरान राममंदिर निर्माण के कारण देश में हिंदुत्व की लहर थी, जिसके वजह से वह 35 हजार वोटों से चुनाव हार गए थे।
बालासाहेब ठाकरे से मांगी मदद
लेकिन विलासराव देशमुख ने हार नहीं मानी और वे सीधे शिवसेना में बालासाहेब ठाकरे के पास मदद के लिए पहुंचे। उन्होंने शिवसेना में बालासाहेब ठाकरे की मदद से विधान परिषद का चुनाव लड़ने की तैयारी कि और सीधे मातोश्री पहुंचे। महाराष्ट्र में विलासराव की पकड़ को देखते हुए बालासाहेब भी उन्हें रोक नहीं पाए और उनका साथ दिया। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ विधान परिषद का चुनाव लड़ा लेकिन सपोर्ट होने के बावजूद वे चुनाव हार गए। इस हार के बाद मानो विलासराव देशमुख के मुख्यमंत्री बनने के रास्ते बंद होते नजर आ रहे थे।
मुख्यमंत्री पद से देना पड़ा इस्तीफा
1999, यह वह दौर था जब भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सरकार में थी। 1999 में शिवसेना और भाजपा को रोकने के लिए एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर लड़ाई लड़ी। विलासराव को भी इस गठबंधन में उम्मीद दिखी और उन्होंने 1999 में कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें रिकॉर्ड वोटों से जीत मिली, जिसके चलते वे 18 अक्टूबर 1999 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनें। 2004 में एक बार फिर वापसी करते हुए विलासराव देशमुख ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी दूसरी पारी शुरू की। लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चल पाई। दरअसल, 26 नवंबर 2008 के आतंकवादी हमलेके बाद उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
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देशमुख 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। लेकिन अपने गृह ज़िले लातूर की सीट आरक्षित होने और पड़ोसी उस्मानाबाद सीट एनसीपी के पास जाने के कारण वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सके। लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति पर देशमुख की पकड़ को देखते हुए, बाद में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया और 28 मई 2009 को वे केंद्र सरकार में भारी उद्योग मंत्री बने। जनवरी 2011 से जुलाई 2011 तक वे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे। इसके बाद जुलाई 2011 में एक बार फिर उनका विभाग बदला गया और देशमुख को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया गया।
विलासराव देशमुख ने वकालत की पढ़ाई की थी और हार मानना कभी सीखा नहीं था। उन्होंने 1973 में वैशाली से शादी की थी। उनके तीन बेटे है, रितेश देशमुख, धीरज देशमुख और अमित देशमुख।
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