जलगांव में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से नवजात की मौत, अस्पताल प्रशासन ने शवगृह में जगह देने से भी किया मना
Jalgaon News: जलगांव के चालीसगांव में टीकाकरण के बाद ढाई महीने की एक बच्ची की मौत हो गई। बेहद शर्मनाक बात यह रही कि जलगांव सरकारी अस्पताल ने शव को रात में मॉर्चुरी में रखने से मना कर दिया।
- Written By: गोरक्ष पोफली
सांकेतिक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Jalgaon Baby Girl Dies After Vaccination: जलगांव जिले के चालीसगांव तहसील से एक ऐसी हृदयविदारक और स्वास्थ्य प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने वाली घटना सामने आई है। तहसील के टाकली प्र.चा. गांव में सरकारी स्कूल में टीकाकरण (Vaccination) के तुरंत बाद ढाई महीने की एक मासूम बच्ची की मौत हो गई। इस भीषण दुख के बीच, सरकारी अस्पताल की जो संवेदनहीनता सामने आई, उसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। जलगांव के सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (GMC) ने बच्ची के शव को रात में मॉर्चुरी में रखने से साफ इनकार कर दिया। इसके चलते बेबस दादा को अपनी लाडली पोती का शव रातभर गोद में लेकर अस्पताल के बाहर गुजारनी पड़ी।
क्या है पूरी घटना?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, चालीसगांव तालुका के टाकली प्र.चा स्थित जिला परिषद स्कूल में मंगलवार, 12 मई को नियमित टीकाकरण अभियान चल रहा था। इस ढाई महीने की मासूम बच्ची को पेंटा सहित अन्य टीके लगाए गए थे। मृत बच्ची के दादा तुलसीदास मराठे ने बताया कि टीका लगाने से पहले सुबह 10 बजे तक बच्ची पूरी तरह स्वस्थ थी और खेल रही थी। लेकिन सुबह 10:30 बजे जैसे ही उसे टीका लगाया गया, उसके कुछ ही मिनटों बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और उसके शरीर की हलचल धीमी हो गई।
घबराए परिजन उसे तुरंत चालीसगांव के एक निजी अस्पताल ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने जांच के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया। परिजनों का सीधा आरोप है कि स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही और गलत वैक्सीन के कारण ही बच्ची की जान गई है। मृत बच्ची के पिता दीपक बोरसे भारतीय सेना (Indian Army) में हैं और इस समय अयोध्या में देश की सेवा में तैनात हैं। पिता की अनुपस्थिति में इस हादसे ने बोरसे और मराठे परिवार पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया है।
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रातभर शव बाहर रखने को मजबूर हुए दादा
बच्ची की मौत का सही कारण जानने के लिए पोस्टमार्टम (Post-mortem) हेतु उसके शव को जलगांव के सरकारी अस्पताल लाया गया। लेकिन, रात के समय अस्पताल प्रशासन ने कानूनी तकनीकी कारणों का हवाला देकर शव को अपने कब्जे में लेने या मॉर्चुरी में रखने से मना कर दिया।
भावुक होकर दादाजी तुलसीदास मराठे ने डॉक्टरों और स्टाफ से मिन्नतें कीं, पोस्टमार्टम भले ही रात में मत करो, लेकिन इस मासूम के शव को रातभर के लिए सुरक्षित अंदर रख लो। लेकिन अस्पताल प्रशासन का दिल नहीं पसीजा। आखिरकार, लाचार दादा को पोस्ट मॉर्टम विभाग के बाहर कड़कड़ाती रात में बच्ची का शव अपनी गोद में लेकर बैठना पड़ा और उन्होंने जागकर पूरी रात काटी। बुधवार सुबह जब यह बात अन्य मरीजों के परिजनों और मीडिया के सामने आई, तो अस्पताल में भारी आक्रोश फैल गया। बुधवार शाम को टाकली में गमगीन माहौल में मासूम का अंतिम संस्कार किया गया।
अस्पताल प्रशासन की क्या है दलील?
इस पूरे मामले पर चौतरफा घिरने के बाद जलगांव सरकारी अस्पताल के डीन (अधिष्ठाता) डॉ. गिरीश ठाकुर ने अपनी सफाई पेश की है। उन्होंने कहा, नियम के मुताबिक, शव को पोस्टमार्टम के लिए लाते समय पुलिस का पंचनामा या मृत्यु प्रमाण पत्र साथ होना चाहिए था, या फिर संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों को इस बारे में अस्पताल प्रशासन को पहले सूचित करना चाहिए था। चूंकि बच्ची के दादा के पास मृत्यु का कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं था, इसलिए शव को सीधे शवगृह में रखना नियमों के खिलाफ था। बुधवार सुबह जब जिला स्वास्थ्य अधिकारी का फोन आया, तब हमने तुरंत प्रक्रिया पूरी कर शव को कब्जे में लिया।
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दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग
कागजी नियमों और तकनीकी औपचारिकता की आड़ में एक मृत मासूम बच्ची के शव के साथ हुआ यह व्यवहार बेहद शर्मनाक है। एक तरफ जहां देश की सीमा पर तैनात फौजी का परिवार इस सिस्टम का शिकार हुआ, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता खुलकर उजागर हो गई। अब पीड़ित परिवार और ग्रामीणों ने टीकाकरण करने वाली टीम और शव को ठुकराने वाले अस्पताल प्रशासन दोनों की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
