नक्सल प्रभावित गड़चिरोली जिले में बिछा मोबाइल-फाइबर टेक्नोलॉजी जाल, लैंडलाइन सरकारी दफ्तरों तक सीमित
Gadchiroli News: मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल से लैंडलाइन टेलीफोन लगभग इतिहास बन गए। बीएसएनएल अब फाइबर नेटवर्क के विस्तार पर ध्यान दे रहा है।
- Written By: आकाश मसने
लैंडलाइन फोन (सोर्स: सोशल मीडिया)
Gadchiroli Landline Telephone News: मोबाइल, सोशल मीडिया और संपर्क के अलग-अलग साधन उपलब्ध होने के कारण पहले से सेवा देते हुए आ रहे लैंडलाइन टेलीफोन अब दरकिनार होते दिखाई दे रहे है। वर्तमान में लैंडलाइन टेलीफोन का अस्तित्व केवल सरकारी कार्यालय अथवा स्थानीय संस्था तक ही सीमित रह गया है।
अब लैंडलाइन टेलीफोन इतिहास में जमा होने के कगार पर होकर इसका विस्तार अब फाइबर में हो रहा है। आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाते हुए बीएसएनएल जिले में भी अब फाइबर के जाल अधिक मजबूत करते दिखाई दे रहा है।
तीन दशक पहले घर-घर में टेलीफोन होना अमीर होने का प्रमाण माना जाता था। लेकिन आधुनिक तकनीकी ज्ञान के समय में मोबाइल ने टेलीफोन की जगह ली है। अब गरीबों से लेकर अमीरों तक सभी के हाथों में मोबाइल दिखाई देने से टेलीफोन को दरकिनार किया गया है।
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वर्ष 2000 की अवधि में आदिवासी बहुल और नक्सल प्रभावित गड़चिरोली जिले में करीब 20 हजार घरों में लैंडलाइन टेलीफोन था। लेकिन वर्तमान स्थिति में ग्रामीण परिसर की सेवा पूरी तरह बंद कर शहरी क्षेत्र में गिने-चुने जगहों पर ही लैंडलाइन टेलीफोन होने की जानकारी बीएसएनएल से मिली है।
भारत में 1998 में आया मोबाइल
देश में 1998 के दौरान मोबाइल का आगमन हुआ। इसका उपयोग करने के लिए और कहीं पर भी ले जाना आसान होने के कारण धीरे-धीरे लैंडलाइन की मांग कम होने लगी। गड़चिरोली जिले में मोबाइल का आगमन होने में काफी विलंब हुआ था। लेकिन वर्तमान में लगभग सभी के पास मोबाइल उपलब्ध होने से दूर ध्वनि सेवा की ओर अनदेखी की जा रही है। जिसका नतीजा लैंडलाइन टेलीफोन धीरे-धीरे बंद होने लगे।
7,000 टेलीफोन को फाइबर से जोड़ा
गड़चिरोली जिले में बीएसएनएल ने उभरने के लिए कॉपर टू फाइबर का सफर शुरू किया। बीएसएनएल ने लैंडलाइन को ही स्पीड इंटरनेट सेवा देने की शुरूआत करते हुए दोबारा बाजार में अपना कदम जमाया। वर्तमान में जिले में 7 हजार से अधिक लैंडलाइन टेलीफोन को फाइबर जोड़ा गया है। जिले में लैंडलाइन का पुराना नंबर फाइबर में अपग्रेड कर देने पर बीएसएनएल जोर दे रहा है।
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फोन उठाने की उत्सुकता रहती थी
अविनाश महाजन ने कहा कि दो दशक पहले बातचीत करने के लिए एकमात्र साधन लैंडलाइन था। हमारे घर में भी उस समय टेलीफोन था। उसका उपयोग केवल घर के सदस्य नहीं पड़ोसी भी कर रहे थे। घर में टेलीफोन की घंटी बजने पर फोन किसका है यह देखने फोन उठाने की उत्सुकता रहती थी। लेकिन यह उत्सुकता मोबाइल आने पर कम हो गयी। अब सभी के हाथों में मोबाइल दिखाई देने पर टेलीफोन की आवश्यकता नहीं पड़ रही है।
टेलीफोन का स्मरण सदैव रहेगा
विलास दशमुखे ने कहा कि जब मोबाइल जिले में नहीं था। उस समय हमारे घर में लैंडलाइन टेलीफोन था। किसी का महत्वपूर्ण संदेश अथवा अपने परिजन और रिश्तेदारों से बातचीत करने के लिए टेलीफोन ही एकमात्र साधन बना था। विशेषत: टेलीफोन उठाने के लिए बच्चों में काफी उत्साह रहता था। मोबाइल आने से पहले टेलीफोन भी हमे एक-दूसरे से जोड़े रखा था। जिससे टेलीफोन का स्मरण सदैव रहेगा।
