गढ़चिरौली में ‘हरियाली का संकल्प’; 200 आदिवासी महिलाओं को मिला रोजगार, 25 एकड़ में तैयार हुई विशाल पौधशाला
Hariyali Ka Sankalp Gadchiroli Nursery: गढ़चिरौली में 200 महिलाओं को मिला रोजगार। MIAM ट्रस्ट और सूरजगड़ इस्पात की पहल से 25 एकड़ में तैयार हुई नर्सरी।
- Written By: अनिल सिंह
प्रकृति और प्रगति का बेजोड़ संगम: 5 लाख पौधों की नर्सरी से संवर रही गढ़चिरौली की ग्रामीण अर्थव्यवस्था (फोटो क्रेडिट-X)
Hariyali Ka Sankalp Gadchiroli: महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला, जो अपनी प्राकृतिक संपदा और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है, अब एक ‘हरित क्रांति’ का केंद्र बन रहा है। यहाँ शुरू की गई ‘हरियाली का संकल्प’ परियोजना ने यह सिद्ध कर दिया है कि पर्यावरण की रक्षा और आर्थिक प्रगति एक साथ चल सकते हैं। एमआईएएम चैरिटेबल ट्रस्ट और सूरजगड़ इस्पात प्राइवेट लिमिटेड की इस साझा पहल ने न केवल क्षेत्र के हरित आवरण को बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, बल्कि स्थानीय समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग भी प्रशस्त किया है।
इस परियोजना के केंद्र में 25 एकड़ में फैली एक विशाल नर्सरी है। यहाँ केवल पौधे ही नहीं उगाए जा रहे, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के कौशल को भी तराशा जा रहा है। नर्सरी में काम करने वाली 200 से अधिक महिलाएं अब पौधशाला प्रबंधन की बारीकियों को समझ रही हैं, जिससे उन्हें आय का एक स्थायी और सम्मानजनक स्रोत मिला है।
कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण
महिलाओं को केवल मजदूरी तक सीमित न रखते हुए, उन्हें वैज्ञानिक तरीके से पौध तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में मिट्टी तैयार करना, जैविक खाद (कंपोस्टिंग) का निर्माण, पॉलीबैग तैयार करना और पौधों की नस्ल सुधारने के लिए ‘ग्राफ्टिंग’ जैसी महत्वपूर्ण तकनीकें शामिल हैं। यह कौशल विकास इन महिलाओं को भविष्य में खुद का लघु उद्योग शुरू करने के लिए भी सक्षम बना रहा है।
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आदिवासी क्षेत्रों में बदलाव की लहर
एमआईएएम चैरिटेबल ट्रस्ट की संस्थापक नीतू जोशी का मानना है कि सेवा का वास्तविक अर्थ जरूरतमंदों को सशक्त बनाना है। 2020 में अपनी स्थापना के बाद से ही यह ट्रस्ट स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। गढ़चिरौली के पिछड़े और दुर्गम क्षेत्रों में इस हरित पहल के माध्यम से ट्रस्ट ने सामुदायिक कल्याण का एक अनूठा मॉडल पेश किया है।
प्रकृति और प्रगति का समन्वित मॉडल
इस पहल के परिणाम अब धरातल पर दिखने लगे हैं। एक ओर जहाँ वृक्षारोपण के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से निपटने की तैयारी है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज की मुख्यधारा में भागीदारी बढ़ रही है। यह परियोजना दर्शाती है कि यदि औद्योगिक इकाइयां और सामाजिक संस्थाएं मिलकर कार्य करें, तो विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुँचाया जा सकता है। गढ़चिरौली की यह नर्सरी आज न केवल पौधों की आपूर्ति कर रही है, बल्कि हजारों परिवारों की उम्मीदों को भी सींच रही है।
