ताडोबा बचाने की मुहिम (AI generated image)
Chandrapur Mine Protest: चंद्रपुर में ताडोबा-अंधारी व्याघ्र प्रकल्प से उमरेड-करह्रांडला वन्यजीव अभयारण्य तथा नवेगाव-नागझिरा व्याघ्र प्रकल्प को जोड़ने वाले संवेदनशील व्याघ्र कॉरिडोर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘लोहारडोंगरी’ लौह अयस्क खदान को रद्द करने की मांग को लेकर चल रहे ‘सेव लोहारडोंगरी, सेव ताडोबा’ ऑनलाइन अभियान को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिल रहा है। कुछ ही दिनों में इस याचिका पर 20,000 से अधिक हस्ताक्षर दर्ज किए जा चुके हैं, जिससे आंदोलन और तेज हो गया है।
ब्रह्मपुरी वन विभाग का यह क्षेत्र 60 से अधिक बाघों का प्राकृतिक आवास माना जाता है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि खनन कार्य से इस महत्वपूर्ण कॉरिडोर को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
परियोजना के लिए 35.94 हेक्टेयर क्षेत्र में 18,024 पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
पिछले पांच वर्षों में जिले में वन्यजीवों के हमलों में तकरीबन 200 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि वर्ष 2025 में 47 ग्रामीणों की मृत्यु दर्ज की गई है। खदान में होने वाले विस्फोट और जंगल कटाई से वन्यजीवों के रिहायशी क्षेत्रों में आने का खतरा बढ़ सकता है।
परियोजना के माध्यम से 120 लोगों को रोजगार मिलने का दावा किया गया है, किंतु जानकारी के अनुसार स्थायी रोजगार केवल 32 लोगों को ही मिलेगा, वह भी विशेष कौशल वाले व्यक्तियों को।
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राज्य वन्यजीव मंडल के पूर्व सदस्य बंडू धोतरे ने कहा कि यह मुद्दा केवल चंद्रपुर तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण व्याघ्र संरक्षण से जुड़ा है। उनका मत है कि पहले से ही नहरों, सिंचाई परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण के कारण जंगल खंडित हो चुके हैं, ऐसे में खदान को अनुमति देना पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा होगा। उन्होंने आसपास के गांवों में मानव-वन्यजीव संघर्ष, वायु और जल प्रदूषण तथा कृषि क्षेत्र पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की।
इको-प्रो संस्था की ओर से लोहारडोंगरी क्षेत्र में कई अध्ययन यात्राएं आयोजित की गई हैं। नागपुर और चंद्रपुर के पर्यावरण, सामाजिक और विधिक क्षेत्र से जुड़े अनेक मान्यवरों ने स्थल का दौरा कर स्थिति का आकलन किया है। पर्यावरण संरक्षण और व्याघ्र कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर चल रहा यह आंदोलन अब व्यापक जनसमर्थन का रूप लेता जा रहा है।