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महंगाई की छुट्टी! महाराष्ट्र के इस गांव में LPG की जरूरत नहीं, गोबर से जलते हैं 200 से ज्यादा चूल्हे
Vidarbha News: विदर्भ का 'रेंगेपार कोहली' गांव बायोगैस से बना आत्मनिर्भर। 225 प्लांट के जरिए ग्रामीण खुद बना रसोई गैस रहे हैं। एलपीजी की बढ़ती कीमतों और किल्लत से मिली हमेशा के लिए मुक्ति।
- Written By: आकाश मसने

भंडारा जिले का रेंगेपार कोहली गांव (सोर्स: IANS)
Bhandara Rangepar Kohli Village Biogas Model: आज के दौर में जहां रसोई गैस (LPG) की बढ़ती कीमतें आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही हैं, वहीं महाराष्ट्र के भंडारा जिले का एक छोटा सा गांव ‘रेंगेपार कोहली’ मिसाल पेश कर रहा है। विदर्भ क्षेत्र के लखनी तालुका में स्थित करीब 2,000 की आबादी वाले इस गांव को सिलेंडर खत्म होने या उसकी बढ़ती कीमतों की कोई चिंता नहीं है। यहां के ग्रामीणों ने ‘गोबर’ को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है।
1987 में शुरू हुआ था यह क्रांतिकारी सफर
इस आत्मनिर्भरता की कहानी आज की नहीं, बल्कि तीन दशक पुरानी है। गाँव के सरपंच मनोहर बोरकर बताते हैं कि साल 1987 में पहली बार गाँव में बायोगैस की योजना आई थी। उस समय लोगों के मन में संशय था कि क्या वाकई गोबर से गैस बन सकती है? लेकिन धीरे-धीरे लोगों का नजरिया बदला और 1987 के अंत तक गाँव में करीब 200 बायोगैस प्लांट तैयार हो गए। आज स्थिति यह है कि गाँव में 200 से 225 बायोगैस प्लांट सुचारू रूप से चल रहे हैं।
हर घर में मवेशी, हर घर में गैस
रेंगेपार कोहली गांव की सबसे खास बात यह है कि यहां लगभग हर घर में दुधारू मवेशी हैं। पशुओं से मिलने वाले गोबर का इस्तेमाल ये ग्रामीण बायोगैस बनाने में करते हैं। गाँव के निवासी देवदास रघुनाथजी लांजेवार बताते हैं, “हमारे पास 5-6 जानवर हैं। उनके गोबर से हम रोज खाना बनाते हैं और बची हुई गैस से पानी भी गर्म करते हैं। अगर घर में मेहमान आ जाएं, तब भी बायोगैस कम नहीं पड़ती। हमने सालों से गैस सिलेंडर का चेहरा नहीं देखा।”
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भंडारा जिले का रेंगेपार कोहली गांव
पंचायत की अनूठी पहल: सुबह मिलता है गर्म पानी
भंडारा जिले का यह गांव सिर्फ खाना बनाने तक ही सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत ने बायोगैस के इस मॉडल को इतना प्रभावी बना दिया है कि सुबह 6 से 9 बजे तक पूरे गांव के लिए गर्म पानी की व्यवस्था भी इसी सिस्टम के माध्यम से की जाती है। सरपंच का कहना है कि जहाँ अन्य गाँवों में लोग सब्सिडी और सिलेंडर की बुकिंग के लिए परेशान रहते हैं, हमारे यहां सिस्टम इतना मजबूत है कि ईंधन की बचत के साथ-साथ परिवारों की आर्थिक स्थिति भी सुधर रही है।
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सरकारी योजनाओं का मिला लाभ
गाँव के एक अन्य लाभार्थी ईश्वरदास बाबूराव हटवार ने बताया कि उनके घर में बायोगैस प्लांट उनकी बहू के नाम पर मिला है। वे कहते हैं, “शुरुआत में मवेशी कम होने से दिक्कत आई थी, लेकिन सरकारी बायोगैस स्कीम ने सब आसान कर दिया। अब हमें सिलेंडर की लाइन में लगने की जरूरत नहीं पड़ती।”
पर्यावरण और जेब दोनों के लिए फायदेमंद
रेंगेपार कोहली का यह ‘एनर्जी मॉडल’ न केवल प्रदूषण मुक्त ईंधन देता है, बल्कि बायोगैस प्लांट से निकलने वाली स्लरी (वेस्ट) खेतों के लिए बेहतरीन जैविक खाद का काम करती है। इससे किसानों की रसायनिक खाद पर निर्भरता भी कम हुई है। आज यह गाँव पूरे देश के लिए ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (कचरे से कंचन) का जीवंत उदाहरण बन गया है।
Maharashtra bhandara rangepar kohli village biogas energy model success story
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