नदी बने रेगिस्तान (सौजन्य-नवभारत)
Ground Water Survey Bhandara: भंडारा जिले में भीषण गर्मी की आधिकारिक शुरुआत से पहले ही पानी की किल्लत का साया गहराने लगा है। मार्च महीने के मध्य में ही जिले की सूर और चुलबंद जैसी महत्वपूर्ण नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं और अब इन नदी पात्रों ने रेगिस्तान का स्वरूप धारण कर लिया है।
पिछले मानसून में संतोषजनक बारिश होने के बावजूद, गर्मी के धान के लिए पानी के बेतहाशा उपयोग और अवैध रेत तस्करी के कारण भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया है। यह स्थिति आने वाले अप्रैल और मई के महीनों में जिले के लिए बड़े खतरे का संकेत दे रही है। भंडारा जिला प्राकृतिक रूप से जल संसाधनों से समृद्ध माना जाता है, लेकिन इस बार मार्च में ही नदियों की स्थिति चिंताजनक हो गई है।
जिले की जीवनदायीनी कही जाने वाली वैनगंगा नदी का प्रवाह भी गोसीखुर्द बांध के बाहरी क्षेत्रों में काफी धीमा पड़ गया है। कई जगहों पर केवल रेत के ढेर और छोटे गड्ढे ही दिखाई दे रहे हैं। तुमसर और मोहाडी तहसील से बहने वाली सूर नदी तथा साकोली व लाखांदुर की चुलबंद नदी का तल पूरी तरह उघड़ चुका है। नदियों के सूखने से उन पर आधारित ग्रामीण जलापूर्ति योजनाएं भी संकट में पड़ गई हैं, जिससे कई गांवों में प्यास बुझाने का संघर्ष शुरू हो गया है।
भूजल सर्वेक्षण विभाग के आंकड़ों ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। जिले की 74 निरीक्षण कुओं के माध्यम से की गई जांच में पता चला है कि पिछले 5 वर्षों के औसत की तुलना में भूजल स्तर 0.50 से 1.5 मीटर तक नीचे चला गया है। विशेष रूप से लाखांदुर, साकोली और मोहाडी तहसील इस गिरावट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण कार्यों के दौरान रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की अनदेखी और बोरवेल के बढ़ते अनियंत्रित इस्तेमाल ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। इसके साथ ही, जिले के 33 रेत घाटों पर होने वाले अवैध उत्खनन ने जमीन की जल संचयन की प्राकृतिक क्षमता को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जिससे वॉटर रिचार्ज की प्रक्रिया बाधित हुई है।
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धान की ग्रीष्मकालीन खेती और बढ़ते निर्माण कार्यों के लिए पानी का बेहिसाब इस्तेमाल हमारे भूजल भंडार को तेजी से खत्म कर रहा है। यदि समय रहते जल संरक्षण के ठोस उपाय नहीं किए गए और नागरिक पानी के किफायती उपयोग पर ध्यान नहीं देंगे, तो आने वाले महीनों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। फिलहाल ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं का जलस्तर भी काफी नीचे जा चुका है, जिससे नागरिकों में अभी से टैंकर पर निर्भर होने की नौबत आने का डर समा गया है।
नदियों और नालों के सूखने का सबसे बुरा असर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन पर पड़ रहा है। चारे और पानी की कमी के कारण मवेशियों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया है। वहीं, जंगलों के प्राकृतिक जल स्रोत सूखने से वन्यजीवों के भी पानी की तलाश में मानवीय बस्तियों की ओर आने का खतरा बढ़ गया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
दूसरी ओर, नदियों के सूखे पात्रों में अब बड़े पैमाने पर तरबूज और खरबूजे की खेती की जा रही है। हालांकि यह स्थानीय किसानों के लिए आय का साधन है, लेकिन यह इस कड़वे सच का प्रमाण भी है कि नदियों की मुख्य धारा अब लुप्त होने के कगार पर है।