स्मृति दिवस पर राष्ट्रीय हिंदी परिषद का उद्घाटन, महंगाई–अन्याय पर बेबाक आवाज थे दुष्यंत कुमार
Hindi Literature Seminar: दुष्यंत कुमार के साहित्य में समाज की असमानता, संघर्ष और सत्ता की असंवेदनशीलता का प्रखर चित्रण मिलता है। उनकी कविता आज भी सामाजिक चेतना का मार्ग दिखाती है।
- Written By: अंकिता पटेल
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
National Hindi Conference: छत्रपति संभाजीनगर हिंदी कवि, गजलकार व आलोचक प्रा। वशिष्ठ अनूप ने कहा कि दुष्यंत कुमार के साहित्य की स्पष्ट भूमिका व प्रखर अभिव्यक्ति के चलते आज भी हमें मार्गदर्शन के लिए उनकी ओर मुड़ना पड़ता है।
उनके लेखन में सिर्फ भावनाओं का आविष्कार नहीं था, बल्कि समाज की अस्वस्थता, असमानता व संघर्ष का प्रखर प्रतिबिंब दिखाई देता है। उनके जमाने में कई लोग मौन रहना पसंद करते थे।
वहीं दुष्यंत कुमार एक दायरे तक सीमित कवि नहीं थे। महंगाई, बेरोजगारी, अन्याय, सत्ता की असंवेदनशीलता व जनता में छिपी शांति पर उन्होंने बेबाक तरीके से विचार रखे।
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दुष्यंत कुमार की कविता सिर्फ साहित्यकृति नहीं, बल्कि समाजजागृति का प्रभावी माध्यम साबित हुई। गजलकार दुष्यंत कुमार के 50वें स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में महात्मा गांधी मिशन विश्वविद्यालय की भारतीय व विदेशी भाषा संस्था की ओर से दो दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी परिषद का उद्घाटन रुक्मिणी सभागृह में किया गया, तब वे विचार रख रहे थे।
‘पूरा रदीफ़, अधूरा काफिया’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिषद में दुष्यंत कुमार के साहित्यिक योगदान पर सघन व अभ्यासपूर्ण चर्चा की जाएगी।
उनकी गजों का सामाजिक यथार्थ, संवेदनशीलता, विद्रोही चेतना व समकालीन हिंदी साहित्य पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। मंच पर डॉ. संजय मोहड़, अधिष्ठाता डॉ. जॉन चेल्लादुराई, संचालक डॉ. केपी सिंह उपस्थित थे।
पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि दुष्यंत कुमार की कविता ‘रोशनी के लिए दुष्यंत के पास हमें बार-बार जाना पड़ेगा’ जमीन के वास्तव अनुभवों से लिखी गई है।
गजलकार नहीं, आंदोलन थे आलोक त्यागी
विख्यात गजलकार आलोक त्यागी ने कहा कि दुष्यंत कुमार महज साहित्यकार या गजलकार नहीं थे, बल्कि एक आंदोलन थे। कोई भी बंधन का पालन किए बगैर वे निर्भीक व स्पष्ट तरीके से अभिव्यक्त हुए।
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अहिंदी भाषा के लिए कार्यरत एमजीएम विवि ने दुष्यंत कुमार के समग्र साहित्य पर दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित कर ऐतिहासिक कदम उठाया है।
