

Dalit Basti Improvement Scheme Maharashtra: छत्रपति संभाजीनगर अनुसुचित जाति व नवबौद्ध बस्तियों के विकास के लिए लागू 'दलित बस्ती सुधार योजना के क्रियान्वयन में अनियमितताओं की पृष्ठभूमि में जिलाधिकारी की निगरानी में नियंत्रण तंत्र स्थापित किया जाए, यह निर्देश बॉम्बे उच्च न्यायालय को औरंगाबाद खंडपीठ के न्यायधिश विभा केकणवाड़ी व न्यायधिश हितेन वेणेगांवकर की पीठ ने जिलाधिकारी को दिए हैं।
इस बारे में लातूर के सामाजिक कार्यकर्ता महेश अलगुड़े व अन्य लोगों ने एड। देवदत्त पालोदकर की ओर से जनहित याचिका दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि अनुसूचित जाति की चस्तियों में मूलभूत नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार ने अनुसूचित जाति, नवबौद्ध बस्ती विकास योजना अर्थात दलित बस्ती सुधार योजना शुरू की है।
महाराष्ट्र की 37,558 दलित बस्तियों में सड़क, पानी, बिजली, नाली व सामुदायिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार हर वर्ष जिला परिषदों के जरिए करोड़ों रुपये की निधि उपलब्ध कराती है। याचिका में कहा गया है कि निधि का वितरण संतुलित तरीके से कराने व सभी बस्तियों को इसका लाभ दिलाने के लिए राज्य सरकार ने 5 दिसंबर 2011 कोशासन निर्णय जारी कर विस्तृत दिशा निर्देश तय किए थे।
इसके अनुसार जिला परिषद को निधि वितरण की इकाई मानते हुए हर तहसील में अनुसूचित जाति की आबादी के अनुपात में निधि का वितरण करना, प्राथमिकता के अनुसार काम मंजूर करना व विभिन्न बस्तियों में बारी-बारी से विकास कार्य देना तय किया गया था।
याचिका में आरोप लगाया गया कि इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। मामले में राज्य सरकार, विभागीय आयुक्त, समाज कल्याण अधिकारी व लातूर जिला परिषद को प्रतिवादी बनाया गया था।
प्रारंभिक सुनवाई के बाद खंडपीठ ने सभी प्रतिवादियों को हलफनामा पेश करने के निर्देश दिए थे। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि शासन निर्णयों को लागू करना प्रशासन की जिम्मेदारी है व इसके लिए अलग से आदेश देने की जरूरत नहीं है।