प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Chhatrapati Sambhajinagar Election: छत्रपति संभाजीनगर, महानगरपालिका चुनाव के प्रचार का अंतिम चरण में है। जिले के पालकमंत्री संजय शिरसाट की भूमिका को लेकर शिंदे सेना में तीखी नाराजगी सामने आ रही है। पार्टी के अधिकांश उम्मीदवारों का आरोप है कि चुनावी जिम्मेदारी संभालने के बजाय पालकमंत्री अपना अधिकतर समय केवल अपने बेटे सिद्धांत शिरसाट और पुत्रि हर्षदा शिरसाट के प्रचार में बिता रहे हैं।
इसी पारिवारिक प्राथमिकता को शिंदे सेना की चुनावी कमजोरी और भाजपा के साथ युति न हो पाने का बड़ा कारण माना जा रहा है। पालकमंत्री शिरसाट आपने बेटे और बेटी के प्रचार में जुटे होने का फायदा राज्य में शिदि सेना की सहयोगी भाजपा उठा रही है। भाजपा ने पुरे शहर में अपना जान बिछा कर नियोजनबद्ध तरीके से प्रचार शुरू किया है।
प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा ने अपने दम पर छत्रपती संभाजी नगर महा महानगरपालिका पर एक हाथी सत्ता लाने के लिए पुरी ताकद झोक दी है। महानगरपालिका चुनाव में शिंदे सेना की अंदरूनी कलह अब खुलकर उजागर हो चुकी है।
भाजपा और शिंदे सेना के बीच युति न हो पाने के पीछे शिंदे सेना के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष और आपसी अविश्वास मुख्य वजह बनकर सामने आया है। संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व की आपसी खींचतान ने शिंदे सेना को चुनावी मैदान में कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया है।
पिछले कई महीनों से शिंदे सेना के जिला प्रमुख राजेंद्र जजाल और पालकमंत्री संजय शिरसाट के बीच मतभेद लगातार गहराते गए, यह टकराव अब केवल संगठनात्मक स्तर तक सीमित न रहकर सीधे चुनावी रणनीति पर असर डालता दिखाई दे रहा है।
पार्टी के भीतर समन्वय पूरी तरह टूट चुका है, जिसका सीधा खामियाजा मैदान में उतरे उम्मीदवारों को भुगतना पड़ रहा है। शिंदे सेना प्रमुख और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने संभाजीनगर महानगरपालिका चुनाव में पार्टी की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी पालकमंत्री संजय शिरसाट को सौंपी है।
लेकिन पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि इस जिम्मेदारी को निभाने के बजाय पालकमंत्री ने चुनाव को पारिवारिक प्रतिष्ठा का विषय बना लिया। अपने पुत्र सिद्धांत शिरसाट और बेटी हर्षदा शिरसाट को विजयी बनाने पर पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया है।
स्थिति यह है कि पालकमंत्री संजय शिरसाठ का अधिकांश समय केवल अपने बेटे और बेटी के प्रचार में बीत रहा है। नतीजतन शिंदे सेना के कई उम्मीदवार बिना किसी ठोस रणनीति, नेतृत्व और संसाधनों के चुनाव लड़ने को मजबूर हैं।
पार्टी के भीतर यह भी कहा जा रहा है कि यदि समय रहते समन्वित नियोजन किया गया होता, तो शिंदे सेना भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती थी। चुनाव में भाजपा ने आक्रामक रणनीति अपनाते हुए संगठन, प्रचार और नेतृत्व के स्तर पर पूरी ताकत झोंक दी है। इसके विपरीत शिंदे सेना गुटबाजी और आपसी अविश्वास में उलझी नजर आ रही है।
भाजपा द्वारा दी जा रही कड़ी टक्कर ने शिंदे सेना की कमजोरियों को और अधिक उजागर कर दिया है। रविवार को उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की टी। वी। सेंटर चौक पर आयोजित सभा से भले ही कुछ समय के लिए कार्यकर्ताओं में उत्साह देखने को मिला हो, लेकिन जमीनी हकीकत अलग नजर आई।
शिंदे सेना के कई उम्मीदवार दबी अवाज में यह स्वीकार कर रहे है कि पार्टी के पास न तो मजबूत लीडर हैं और न ही स्पष्ट दिशा, खासतौर पर वे उम्मीदवार जी उद्धव ठाकरे गुट को छोड़कर शिंदे सेना में आए थे, वे खुद को राजनीतिक असुरक्षा के दौर में महसूस कर रहे है। प्रचार की कमी और संगठनात्मक समर्थन के अभाव में उनकी चिता बढ़ती जा रही है।
इसके उलट उद्धव ठाकरे गुट ने शहर में पूरी ताकत झोंक दी है, विधान परिषद के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अंबादास दानवे, पूर्व सांसद चंद्रकांत खैरे सहित अन्य वरिष्ठ नेता यूबीटी उम्मीदवारों के समर्थन में लगातार मैदान में डटे हुए है। इसका सीधा असर चुनावी माहौल पर दिखाई दे रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद फडणवीस का कहना कि भाजपा और शिंदे सेना की युति न हो पाने की जिम्मेदारी शिंदे सेना पर जाती है।
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यह बयान शिंदे सेना की अंदरूनी कमजोरी और नेतृत्व संकट की ओर सीधा संकेत देता है। चुनाव के अंतिम चरण में पालकमंत्री शिरसाट द्वारा अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों के प्रचार की अनदेखी यह साफ कर रही है कि शिंदे सेना में आपसी मतभेद चरम पर है। इन्हीं आंतरिक विवादों, नेतृत्व की विफलता और पारिवारिक प्राथमिकताओं से शिंदे सेना का प्रदर्शन कमजोर होता दिखाई दे रहा है।