किसनराव हुंडीवाले हत्याकांड: हाईकोर्ट ने उम्रकैद पर रोक लगाने से किया इनकार
Kisanrao Hundiwale Murder Case: बहुचर्चित किसनराव हुंडीवाले हत्याकांड में मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने आरोपी की उम्रकैद की सजा पर रोक लगाने और जमानत देने की मांग खारिज कर सजा बरकरार रखी।
Court Verdict (सोर्सः फाइल फोटो-सोशल मीडिया)
Akola Murder Case: बहुचर्चित किसनराव हुंडीवाले हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे आरोपी प्रतीक तोंडे को मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ से बड़ा झटका लगा है। न्यायालय ने उम्रकैद की सजा पर स्थगन लगाकर जमानत पर रिहा करने की उसकी मांग को खारिज करते हुए सजा बरकरार रखी। यह आदेश न्यायमूर्ति उर्मिला जोशीफालके और न्यायमूर्ति निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ ने सुनाया।
प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायालय ने भा.दं.सं. की धारा 143, 147, 302 सहपठित धारा 149 तथा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत प्रतीक तोंडे को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 5 हजार रु। जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने उच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर मुख्य अपील के अंतिम निर्णय तक सजा पर रोक लगाने और जमानत देने की मांग की थी।
हत्याकांड में दोषी प्रतीक तोंडे को राहत नहीं
सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि घटना के समय अन्य आरोपी किसनराव हुंडीवाले पर जानलेवा हमला कर रहे थे, जबकि प्रतीक तोंडे ने शिकायतकर्ता प्रवीण हुंडीवाले को मजबूती से पकड़ रखा था। इसके कारण वह अपने पिता को बचाने के लिए हस्तक्षेप नहीं कर सके। सरकारी पक्ष के इन तर्कों और उपलब्ध साक्ष्यों को न्यायालय ने महत्वपूर्ण माना।
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हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि यदि कोई अवैध जमाव समान उद्देश्य से एकत्र होता है और उसका उद्देश्य हत्या करना होता है, तो उस जमाव का प्रत्येक सदस्य अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस स्तर पर साक्ष्यों का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
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हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
प्रथमदृष्टया आरोपी की अपराध में संलिप्तता स्पष्ट दिखाई देती है, इसलिए सजा पर रोक लगाने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही बनी अहम आधारन्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि मामले में प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही और आरोपी के विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्य पर्याप्त हैं। ऐसे में आरोपी को जमानत देने का कोई औचित्य नहीं है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने जमानत आवेदन खारिज करते हुए उम्रकैद की सजा को यथावत बनाए रखा।
