Maharashtra Municipal Polls:अकोला मनपा चुनाव (सोर्सः सोशल मीडिया)
Akola Municipal Election: अकोला महानगरपालिका चुनाव का प्रचार अब काउंटडाउन की ओर बढ़ चुका है। मनपा चुनाव में खड़े उम्मीदवारों के पास प्रचार के लिए केवल चार दिन शेष रहने से राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है। 13 जनवरी को शाम 5.30 बजे सार्वजनिक प्रचार समाप्त हो जाएगा, जिसके बाद केवल गुप्त प्रचार (डोर-टू-डोर) की अनुमति रहेगी।
सिर्फ़ चार दिन बचे होने के कारण उम्मीदवार दिन-रात प्रचार में जुट गए हैं। हालांकि, पैनलों के बीच तालमेल की कमी ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। चुनाव की घोषणा हुए छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन कई उम्मीदवार अब तक अपने प्रभाग में सभी मतदाताओं तक नहीं पहुंच पाए हैं। बड़े प्रभाग होने के कारण हर घर तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती बन गया है। बचे हुए चार दिनों में बैठकें, पदयात्राएं और नुक्कड़ सभाओं की प्रभावी योजना बनती नहीं दिख रही है।
इसके अलावा, कड़ाके की ठंड और मतदाताओं की बेरुखी भी उम्मीदवारों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। वार्ड आधारित इस चुनाव में राजनीतिक दलों ने तीन या चार उम्मीदवारों के पैनल उतारे हैं। शुरुआत में जो उम्मीदवार एकजुटता और सामूहिक रणनीति की बात कर रहे थे, वे मतदान का दिन नजदीक आते ही बिखरते नजर आ रहे हैं। चर्चा है कि यदि पैनल का कोई उम्मीदवार मतदाताओं से संपर्क करने में कमजोर साबित हुआ या मतदाता उससे असंतुष्ट रहे, तो इसका असर पूरे पैनल पर पड़ सकता है।
“कमजोर उम्मीदवार की वजह से हम हार के गड्ढे में क्यों गिरें इसी सोच के चलते अनुभवी उम्मीदवार अब पैनल के बजाय अपने व्यक्तिगत जनसंपर्क और अपने चुनाव चिह्न पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। कई प्रभागों में पुराने उम्मीदवार अपने साथियों को छोड़कर अकेले ही मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं।
कुछ प्रभागों में अनुभवी उम्मीदवारों के साथ ऐसे नए प्रत्याशी भी दिए गए हैं, जिनका राजनीति से खास जुड़ाव नहीं रहा है। ऐसे में पुराने उम्मीदवारों के लिए नए साथियों को साथ लेकर चलना मुश्किल हो रहा है। उन्हें चुनाव प्रचार की रणनीति, मतदाताओं से संवाद की शैली और राजनीतिक समीकरण समझाने में काफी समय लग रहा है।
इस चुनावी अभियान में महायुति और महाविकास अघाड़ी के प्रचार के तरीके में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ सार्वजनिक सभाएं की हैं, जिससे उनके कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह है।
वहीं कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के वरिष्ठ नेताओं की अब तक कोई बड़ी बैठक नहीं हुई है। इसके कारण इन दलों के उम्मीदवार खुद को चुनावी अभियान में अकेला महसूस कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं के बीच भी असंतोष दिखाई दे रहा है। चूंकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार गुट) भाजपा के साथ सत्ता में है, इसलिए उन्हें अपने वरिष्ठ नेताओं के समर्थन की ज्यादा चिंता नहीं दिख रही है।