अहिल्यानगर में 60 करोड़ मनी लॉन्ड्रिंग का शक, Ashok Kharat Case से सहकारिता तंत्र पर सवाल
Ashok Kharat Money Laundering: अहिल्यानगर के चर्चित अशोक खरात मामले में 100 फर्जी खातों के जरिए 60 करोड़ के लेन-देन का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों को मनी लॉन्ड्रिंग का शक है।
- Written By: अपूर्वा नायक
अशोक खरात (सोर्स: सोशल मीडिया)
Ashok Kharat Money Laundering Cooperative Scam: चर्चित अशोक खरात प्रकरण ने सहकारिता क्षेत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस मामले में सामने आए तथ्यों से संकेत मिल रहे हैं कि काले धन को अलग-अलग खातों के जरिए वैध दिखाने का खेल लंबे समय से चल रहा था। इसे मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका से जोड़कर देखा जा रहा है।
जांच में अहिल्यानगर की समता पतसंस्था में अलग-अलग नामों से करीब 100 बैंक खाते खोले गए थे जिनके जरिए लगभग 60 करोड़ के लेन-देन का संचालन एक ही व्यक्ति अशोक खरात कर रहा था। इस खुलासे के बाद जिले की कई बड़ी पतसंस्थाएं, बैंक और मल्टीस्टेट सहकारी संस्थाएं भी जांच एजेंसियों के रडार पर आ गई हैं। जिले में कई ऐसी संस्थाएं हैं जहां खरात जैसे ‘अदृश्य जमाकर्ताओं’ के जरिए काले धन को सफेद करने का काम किया जा रहा है।
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कार्य क्षेत्र बढ़ाकर नियंत्रण से बाहर
कई संस्थाओं ने अपना कार्यक्षेत्र जानबूझकर राज्यभर या मल्टीस्टेट स्तर तक बढ़ा लिया है जिससे स्थानीय सहकारिता अधिकारियों का नियंत्रण कमजोर हो गया है। शाखा विस्तार में भी नियमों की अनदेखी कर बड़े स्तर पर लॉबिंग किए जाने के आरोप हैं।
खरात पहुंचा जेल, पुलिस को नहीं मिला PCR
- अदालत ने आठवें मामले में अशोक खरात को पुलिस रिमांड में सौंपने की याचिका खारिज करते हुए गुरुवार को 12 मई तक जेल भेज दिया। उत्तरी महाराष्ट्र में नासिक पुलिस के एसआईटी ने 29 अप्रैल को आठदै मामले में खरात की हिरासत की मांग करते हुए अदालत में एक याचिका दायर की थी।
- अदालत द्वारा आवश्यक अनुमति दिए जाने के बाद, एसआईटी ने खरात को हिरासत में ले लिया। खरात अपने खिलाफ दर्ज यौन शोषण के सातवें मामले के सिलसिले में जेल में था। बलात्कार और वित्तीय धोखाधड़ी में नामजद ‘ढोंगी बाबा’ को सुरक्षा कारणों से वीसी के माध्यम से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट बी एन इचपुरानी के समक्ष आठवें मामले में पेश किया गया।
- पुलिस के मुताबिक, आठवें मामले में खरात पर पारिवारिक समस्याओं के समाधान की तलाश में आई एक महिला का यौन शोषण करने का आरोप है। सुनवाई के दौरान, अभियोजन पक्ष ने नवीनतम मामले में आरोपी की पुलिस हिरासत की मांग की। हालांकि, बचाव पक्ष ने इस मांग का कड़ा विरोध किया और तर्क दिया कि एसआईटी हर बार पुलिस हिरासत के लिए एक ही कारण बता रही है और उसकी याचिका स्वीकार करने का कोई ठोस आधार नहीं है।
परिवारवाद का जाल
कई पतसंस्थाओं में चुनाव महज औपचारिकता बनकर रह गए है। संचालक मंडलों में पिता-पुत्र, ससुर-बहू और करीबी रिश्तेदारों का वर्चस्व है। सदस्य संख्या हजारों में दिखाई जाती है लेकिन सदस्यों की वास्तविकता और दस्तावेजों की जांच को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
सोना गिरवी लेन-देन भी संदेह के घेरे में
फर्जी गहने, बोगस केवाईसी, फर्जी कर्जदार और निजी एजेंसियों के जरिए ग्राहक जुटाने जैसे मामलों ने सोना गिरवी रखने के कारोबार को भी संदेह के घेरे में ला दिया है। कुछ संस्थाओं के लॉकरों में महंगी संपत्तियां रखे जाने की जानकारी भी सामने आई है।
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ऑडिट प्रक्रिया पर भी सवाल
97वें संविधान संशोधन के बाद संस्थाओं को अपने ऑडिटर नियुक्त करने का अधिकार मिला है। आरोप है कि कई जगह ‘सुविधाजनक ऑडिटर’ चुनकर अनियमितताओं पर पर्दा डाला जाता है। ऑडिट फीस में ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ की अलिखित व्यवस्था की भी चर्चा है।
