

Highlights:
रीवा के बैकुंठपुर में दोहरी पहचान का गंभीर आरोप।
एक ही इंसान के कृपाशंकर और विजयशंकर नाम से अलग-अलग रिकॉर्ड होने का दावा।
सरकारी नौकरी, पेंशन और जमीन के लाभ लेने का आरोप।
कांग्रेस ने उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग की।
Rewa Kripashankar Singh Vijayshankar Singh Identity Controversy : रीवा जिले के बैकुंठपुर क्षेत्र से सरकारी अभिलेखों में कथित हेराफेरी और दोहरी पहचान का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि एक ही व्यक्ति कभी विजयशंकर सिंह तो कभी कृपाशंकर सिंह बनकर वर्षों तक अलग-अलग सरकारी व्यवस्थाओं का लाभ उठाता रहा।
मामला सरकारी नौकरी, सेवा पुस्तिका और पेंशन से लेकर आधार कार्ड, मतदाता सूची, जमीन के दस्तावेज, जेल और न्यायालयीन रिकॉर्ड तक पहुंच गया है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. विनोद शर्मा ने इन आरोपों को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
शिकायत के मुताबिक, विजयशंकर सिंह की जन्मतिथि 1 जुलाई 1959 और कृपाशंकर सिंह की जन्मतिथि 1 सितंबर 1967 अलग-अलग सरकारी अभिलेखों में दर्ज है। आरोप है कि विजयशंकर सिंह के नाम से वर्ष 1981 में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिरमौर में वार्ड बॉय के पद पर नियुक्ति हुई थी। उनकी सेवा पुस्तिका में दाहिनी हंसुली के पास तिल का निशान दर्ज होने की बात कही गई है। वहीं, कृपाशंकर सिंह से जुड़े दस्तावेजों में भी अलग शारीरिक पहचान दर्ज होने का दावा है। शिकायतकर्ता का सवाल है कि क्या दोनों नामों के पीछे एक ही व्यक्ति है?
शिकायत में वर्ष 1993, 1994, 1999, 2003, 2004, 2006 और 2009 की मतदाता सूचियों का हवाला दिया गया है। दावा है कि इनमें विजयशंकर सिंह और कृपाशंकर सिंह दोनों नाम दर्ज थे। इतना ही नहीं, अंजू सिंह को अलग-अलग समय पर दोनों की पत्नी के रूप में दर्शाए जाने का आरोप भी लगाया गया है। वर्ष 2010 के बाद मतदाता सूची से कृपाशंकर सिंह का नाम गायब होने और अंजू सिंह का नाम विजयशंकर सिंह की पत्नी के रूप में दर्ज होने की बात कही गई है।
मामले में वर्ष 2005 का एक आपराधिक प्रकरण भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है। शिकायत के अनुसार, बैकुंठपुर के अधिवक्ता विमल सिंह पर जानलेवा हमले के मामले में कृपाशंकर सिंह को दोषी ठहराते हुए रीवा की अदालत ने 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि जेल रिकॉर्ड में दाहिने गाल पर मस्सा, बाईं आंख के पास तिल और दाहिने पैर में पुरानी चोट के निशान दर्ज हैं। वहीं, विजयशंकर सिंह की सेवा पुस्तिका में दाहिनी हंसुली के पास तिल का उल्लेख है। अब इन शारीरिक पहचान के निशानों का चिकित्सकीय परीक्षण कराने की मांग उठाई गई है।
शिकायत में न्यायालयीन दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि जुलाई 2019 में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, सिरमौर की अदालत में संबंधित व्यक्ति की उपस्थिति कृपाशंकर सिंह के नाम से दर्ज हुई थी। इसके अगले महीने जमानत संबंधी कार्यवाही के दौरान उसी मामले में विजयशंकर सिंह के नाम से उपस्थिति दर्ज होने का आरोप है। शिकायतकर्ता ने इन दोनों प्रविष्टियों की प्रमाणित प्रतियां लेकर जांच कराने की मांग की है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2009-10 के आसपास आधार पंजीयन शुरू होने के बाद कृपाशंकर सिंह ने विजयशंकर सिंह के नाम से आधार कार्ड बनवाकर उसका इस्तेमाल किया। वहीं, कृपाशंकर सिंह के रूप में पहचान साबित करने के लिए पुराने मतदाता पहचान पत्र, जमीन की ऋण पुस्तिका और यूनियन बैंक की पासबुक का उपयोग किए जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या अलग-अलग पहचान के जरिए सरकारी नौकरी, पेंशन, जमीन के नामांतरण और अन्य आर्थिक लाभ हासिल किए गए?
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बीच इस शिकायत ने नया सवाल खड़ा किया है। कांग्रेस नेता ने पुराने और नए मतदाता रिकॉर्ड का मिलान कराने की मांग की है। उनका कहना है कि वर्षों तक दो अलग-अलग नामों की प्रविष्टियां कैसे बनी रहीं और वर्ष 2010 के बाद एक नाम किस आधार पर हटाया गया, इसकी जांच होनी चाहिए।
कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता डॉ. विनोद शर्मा ने मांग की है कि दोनों नामों से जुड़े व्यक्तियों को जांच अधिकारी के सामने उपस्थित कराकर वास्तविक पहचान का सत्यापन कराया जाए। आधार, बैंक, मतदाता सूची, सेवा पुस्तिका, जेल रिकॉर्ड, जमीन और न्यायालयीन दस्तावेजों का मिलान हो। उन्होंने कहा कि यदि दोहरी पहचान, दस्तावेजों के दुरुपयोग या सरकारी धन के अनुचित लाभ की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए।